ग्रीनलैंड के पास नहीं है अपनी आर्मी, फिर कैसे सुरक्षित है ये द्वीप? हमला हुआ तो कौन बचाएगा

ग्रीनलैंड के पास नहीं है अपनी आर्मी, फिर कैसे सुरक्षित है ये द्वीप? हमला हुआ तो कौन बचाएगा

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डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है. रूस और चीन की बढ़ती सैन्य ताकत को चुनौती देने के लिए अमेरिका इस रणनीतिक द्वीप पर अपना नियंत्रण चाहता है.

Published date india.com Last updated on - January 11, 2026 4:35 PM IST

email india.com By Gaurav Barar email india.com twitter india.com

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ग्रीनलैंड को लेकर फिर चर्चाएं शुरू

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हाल के दिनों में अमेरिकी राजनीति के गलियारों से एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर बड़ी चर्चाएं शुरू हो गई हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया बयानों में यह स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अमेरिका, रूस और चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को संतुलित करने के लिए ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में कदम उठा सकता है.

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ग्रीनलैंड की स्थिति

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ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका के करीब है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह किंगडम ऑफ डेनमार्क का हिस्सा है. यह एक सेमी-ऑटोनॉमस (अर्ध-स्वायत्त) क्षेत्र है, जिसका अर्थ है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन जैसे आंतरिक मामले ग्रीनलैंड खुद संभालता है हालांकि, जब बात रक्षा और विदेश नीति की आती है, तो इसकी बागडोर पूरी तरह से डेनमार्क के हाथों में होती है. 

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अपनी कोई निजी सेना नहीं

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दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के इस सबसे बड़े द्वीप के पास अपनी कोई निजी सेना नहीं है. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी डेनिश राज्य की है. यदि किसी देश द्वारा ग्रीनलैंड पर हमला किया जाता है, तो उसे सीधे तौर पर डेनमार्क पर हमला माना जाएगा.

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सुरक्षा का ढांचा

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डेनमार्क ने ग्रीनलैंड और फरो आइलैंड्स की संप्रभुता की रक्षा के लिए एक विशेष सैन्य इकाई गठित की है, जिसे जॉइंट आर्कटिक कमांड कहा जाता है. यह इकाई न केवल सैन्य रक्षा करती है, बल्कि इस दुर्गम इलाके में निगरानी, तलाशी अभियान और समुद्री सुरक्षा का जिम्मा भी संभालती है. 

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एक सख्त सैन्य निर्देश आज भी लागू

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डेनमार्क का एक सख्त सैन्य निर्देश, जो 1952 से प्रभावी है, आज भी लागू है. इसके तहत ग्रीनलैंड में तैनात डेनिश बलों को यह स्पष्ट आदेश है कि यदि कोई विदेशी सेना बिना अनुमति के क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिश करती है, तो वे पहले गोली चलाएं और सवाल बाद में पूछें की नीति का पालन करें. यह आदेश इस क्षेत्र की सुरक्षा के प्रति डेनमार्क की गंभीरता को दर्शाता है.

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नाटो का पेंच और संभावित अमेरिकी हस्तक्षेप

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डोनाल्ड ट्रंप के दावों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है. चूंकि डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही नाटो (NATO) के संस्थापक सदस्य हैं, इसलिए उनके बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की संभावना व्यावहारिक रूप से शून्य मानी जाती है. हालांकि, यदि कानूनी चश्मे से देखें तो स्थिति गंभीर हो जाती है.

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अनुच्छेद 5 का उल्लंघन

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नाटो की संधि का अनुच्छेद 5 कहता है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा. यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कोई सैन्य कार्रवाई करता है, तो तकनीकी रूप से यह नाटो के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा.

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सहयोगियों की दुविधा

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ऐसी स्थिति में नाटो के अन्य सदस्य देश एक बड़ी दुविधा में फंस जाएंगे. क्या वे अपने सबसे शक्तिशाली सदस्य (अमेरिका) का साथ दें या संधि के नियमों का पालन करते हुए डेनमार्क की रक्षा करें? 

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ग्रीनलैंड केवल बर्फ की चादर नहीं

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ग्रीनलैंड केवल बर्फ की चादर नहीं है, बल्कि यह प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक स्थान का केंद्र है. चीन और रूस जिस तरह से आर्कटिक क्षेत्र में अपनी पैठ बना रहे हैं, उसे देखते हुए अमेरिका का ग्रीनलैंड के प्रति झुकाव समझ में आता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून, डेनमार्क की संप्रभुता और नाटो के कड़े नियम इसे एक जटिल मुद्दा बनाते हैं.

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