अब पढ़ी-लिखी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता? हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानें क्या कहा

अब पढ़ी-लिखी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता? हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानें क्या कहा

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्नी के ज्यादा पढ़े-लिखे होने पर उसे भरण-पोषण से वंचित करने पर बड़ा फैसला सुनाया. आइए जानते हैं कोर्ट ने क्या आदेश जारी किया और कानूनी अधिकार क्या कहता है?

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Published: January 13, 2026 4:48 PM IST email india.com By Gargi Santosh email india.com Facebook india.com twitter india.com telegram india.com Follow Us india.com Follow Us अब पढ़ी-लिखी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता? हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानें क्या कहा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ता यानी खर्चा-पानी से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत की तरफ से साफ कर दिया है कि पत्नी का ज्यादा पढ़ा-लिखा होना या उसका कोई भी काम करना, उसे गुजारा भत्ता न देने का आधार नहीं बन सकता. कोर्ट ने कहा कि पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पत्नी की योग्यता या संभावित कमाई का बहाना नहीं बना सकता. यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें फैमिली कोर्ट ने महिला की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी थी. हाईकोर्ट ने परिवार अदालत के इस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि कानून का मकसद महिला और बच्चे को बेसहारा होने से बचाना है, न कि तकनीकी आधारों पर उनके अधिकार छीनना।

फैमिली कोर्ट के फैसले पर HC की नाराजगी

फैमिली कोर्ट ने महिला की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उसने अपनी पेशेवर शिक्षा की जानकारी छिपाई और वह बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रह रही है. हालांकि, अदालत ने बच्चे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता तय किया था. महिला ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसके पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है और पति यह साबित करने में असफल रहा कि वह किसी नौकरी या काम से पैसे कमा रही है. दूसरी ओर, पति ने दावा किया कि पत्नी ज्यादा पढ़ी-लिखी है, निजी अध्यापक के तौर पर काम करती है और उसके पास सिलाई-कढ़ाई से जुड़ा आईटीआई डिप्लोमा भी है. हाईकोर्ट ने इन दलीलों को ध्यान से सुना और पाया कि सिर्फ योग्यता होना और वास्तव में कमाई होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.

पत्नी-बच्चों की जरूरतों का ध्यान रखना पति की जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पत्नी की कमाने की संभावना को उसकी वास्तविक कमाई के बराबर नहीं माना जा सकता. अदालत ने माना कि कई महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों, सामाजिक परिस्थितियों और पारिवारिक दबावों के कारण बाहर काम नहीं कर पातीं. कोर्ट ने यह भी पाया कि महिला ने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण घर छोड़ा था और उसके रोजगार से जुड़ा कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है. ऐसे में केवल यह कहना कि वह योग्य है, भरण-पोषण से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कानून पति पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह पत्नी और बच्चे की बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखे.

बच्चे के भरण-पोषण पर भी जताई चिंता

हाईकोर्ट ने बच्चे को दिए जा रहे 3,000 रुपये प्रति माह के गुजारा भत्ते को भी अपर्याप्त बताया. अदालत ने कहा कि आज के समय में बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अच्छे माहौल के लिए इससे ज्यादा आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे का भविष्य सुरक्षित करना भी माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है. आखिर में हाईकोर्ट ने पूरे मामले को परिवार अदालत को वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि वह 1 महीने के अंदर नए सिरे से मामले पर विचार कर उचित आदेश पारित करे.

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गार्गी संतोष, जी मीडिया के India.com में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड सेक्शन की जिम्‍मेदारी संभाल रही हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, हेल्थ, टेक्नोलॉजी, और ... और पढ़ें

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