ट्रंप की नजर अब क्यूबा पर क्यों? अमेरिका से क्या है विवाद, इतिहास में छुपे हैं सारे जवाब
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. वेनेजुएला के घटनाक्रम के बाद अब ट्रंप की सीधी नजर क्यूबा पर है. ट्रंप ने क्यूबा को डील करने या परिणाम भुगतने की दो-टूक चेतावनी दी है.
Updated: January 14, 2026 7:06 AM IST
By Gaurav Barar
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फाइल फोटो
US Cuba Conflict: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के संकेतों के बाद अब अपना ध्यान क्यूबा की ओर केंद्रित कर लिया है. ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ के माध्यम से क्यूबा की सरकार को एक कड़ा अल्टीमेटम दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि क्यूबा को अब अमेरिका के साथ समझौता करना होगा या उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.
ट्रंप ने आरोप लगाया कि क्यूबा लंबे समय से वेनेजुएला से मिलने वाले तेल और धन पर निर्भर रहा है, जिसके बदले में उसने वहां के तानाशाहों को सुरक्षा सेवाएं प्रदान कीं. ट्रंप का दावा है कि हाल ही में वेनेजुएला में हुई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान वहां मौजूद ज्यादातर क्यूबाई सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं.
क्यूबा को नहीं मिलेगी कोई भी मदद
उन्होंने घोषणा की है कि अब वेनेजुएला से क्यूबा को किसी भी तरह की मदद नहीं भेजी जाएगी. ट्रंप का संदेश स्पष्ट है, “वेनेजुएला के पास अब दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना (अमेरिका) है और क्यूबा को बहुत देर होने से पहले समझौता कर लेना चाहिए.”
दुश्मनी की ऐतिहासिक जड़ें
अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव की कहानी एक सदी से भी अधिक पुरानी है. 1898 में स्पेन की हार के बाद क्यूबा अमेरिकी संरक्षण में आया. हालांकि 1902 में इसे स्वतंत्रता मिली, लेकिन प्लैट संशोधन के कारण अमेरिका को क्यूबा के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार बना रहा.
जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार के अनुसार, अमेरिका हमेशा से वेस्टर्न हेमिस्फीयर में किसी बाहरी शक्ति, विशेषकर रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है. क्यूबा के रूस और चीन के साथ घनिष्ठ संबंध अमेरिका की इस रणनीति में सबसे बड़ी बाधा रहे हैं.
शीत युद्ध और प्रतिबंधों का दौर
दुश्मनी की सबसे गहरी नींव 1959 में पड़ी, जब फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका समर्थित बतिस्ता शासन को उखाड़ फेंका. जब कास्त्रो ने सोवियत संघ की ओर हाथ बढ़ाया और अमेरिकी संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया, तो अमेरिका ने सख्त रुख अपना लिया. राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने क्यूबा पर पूर्ण आर्थिक और यात्रा प्रतिबंध लगा दिए.
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इसके बाद अमेरिका ने कास्त्रो सरकार को गिराने के लिए क्यूबाई विद्रोहियों की मदद से एक सैन्य अभियान चलाया, जो बुरी तरह विफल रहा. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि को धक्का लगा. क्यूबा में सोवियत परमाणु मिसाइलों की तैनाती ने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया था. अंततः सोवियत संघ ने मिसाइलें हटाईं और अमेरिका ने क्यूबा पर हमला न करने का वादा किया.
ओबामा की नरमी, ट्रंप की सख्ती
दशकों के अलगाव के बाद, 2014 में बराक ओबामा और राउल कास्त्रो ने संबंधों को सामान्य करने की ऐतिहासिक घोषणा की. दूतावास फिर से खुले, क्यूबा को आतंकवाद समर्थक सूची से हटाया गया और 2016 में ओबामा ने स्वयं क्यूबा की यात्रा की. लेकिन 2017 में ट्रंप के सत्ता में आते ही यह नीति पूरी तरह पलट गई.
ट्रंप ने ओबामा प्रशासन के ज्यादातर फैसलों को रद्द कर दिया. क्यूबा को फिर से आतंकवाद समर्थक देशों की सूची में डाल दिया. दूतावास कर्मियों पर कथित रहस्यमयी हमलों के बाद संबंधों में और कड़वाहट आ गई.
वेनेजुएला, क्यूबा और ‘तानाशाही की तिकड़ी’
ट्रंप प्रशासन ने हमेशा क्यूबा, निकारागुआ और वेनेजुएला को “तानाशाही की तिकड़ी” के रूप में देखा है. ट्रंप का मानना है कि इन देशों की सरकारें क्षेत्र में अस्थिरता फैला रही हैं. वर्तमान में ट्रंप ने खुद को वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति तक घोषित कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे क्षेत्र में बड़े सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए तैयार हैं.
ट्रंप ने रुबियो को बताया क्यूबा का राष्ट्रपति
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए ट्रंप ने वर्तमान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को क्यूबा का राष्ट्रपति बनाए जाने की चर्चाओं को “सुनने में अच्छा” बताया. हालांकि प्रोफेसर राजन कुमार इसे फिलहाल एक अफवाह मानते हैं, लेकिन वेनेजुएला के घटनाक्रम को देखते हुए इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. मार्को रुबियो के माता-पिता क्यूबा से आए अप्रवासी थे और रुबियो स्वयं क्यूबा सरकार के कड़े आलोचक रहे हैं.
क्यूबा वर्तमान में गंभीर आर्थिक संकट, बिजली की किल्लत और दवाओं की कमी से जूझ रहा है. बड़ी संख्या में क्यूबाई नागरिक अमेरिका की ओर पलायन कर रहे हैं. ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप का रवैया क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकता है. क्या क्यूबा घुटने टेकेगा या एक बार फिर इतिहास की तरह संघर्ष का रास्ता चुनेगा, ये आने वाले कुछ महीने तय करेंगे.
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Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
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