...जब मराठों ने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव, जानें क्या थी वडगांव की वो संधि जिसे जानकर गर्व से चौड़ा हो जाएगा आपका सीना
Hindi Gallery Hindi Marathas Defeated British Army Treaty Of Wadgaon How Marathas Humiliated British Empire 8269162 ...जब मराठों ने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव, जानें क्या थी वडगांव की वो संधि जिसे जानकर गर्व से चौड़ा हो जाएगा आपका सीना
Treaty Of Wadgaon: 16 जनवरी, 1779 को अंग्रेजों को वडगांव की संधि पर साइन करना पड़ा. यह एक ऐसा समझौता था, जिसने उन्हें 1773 के बाद हासिल किए गए सभी इलाकों को मराठों को वापस करने और बंबई वापस जाने के लिए मजबूर किया.
Last updated on - January 15, 2026 5:36 PM IST
By Parinay Kumar
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हिल गई थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव
Treaty Of Wadgaon: भारत पर अंग्रेजों ने लगभग 200 साल तक राज किया. इस दौरान देश में अंग्रेजों से कई लड़ाइयां लड़ी गईं. इनमें से एक लड़ाई ऐसी थी, जिसकी चर्चा आज भी होती है. इस लड़ाई में मराठाओं ने अंग्रेजी सेना को करारी शिकस्त दी थी. सन 1779 में वडगांव की लड़ाई में मराठों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव हिलाकर हख दी थी. हालांकि यह जीत ज्यादा समय तक नहीं रही और अंग्रेजों ने बाद में संधि और उसकी शर्तों को तोड़ दिया.
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वडगांव में मराठाओं ने दिखाया दम
वडगांव की लड़ाई सिर्फ एक मिलिट्री मुकाबला नहीं था, यह वह दिन था जब मराठा सेना ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और यह साबित किया कि भारत में किसी भी साम्राज्य को रोकने का दम है. महादजी शिंदे और तुकोजी राव होल्कर जैसे मराठा जनरल, मराठा सेना के सबसे काबिल कमांडरों में से थे. उन्होंने शिवाजी महाराज के समय तानाजी जैसे योद्धाओं द्वारा बनाई गई विरासत को आगे बढ़ाया.
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बॉम्बे पर था अंग्रेजों का कंट्रोल
साल 1775 था और पहला एंग्लो-मराठा युद्ध शुरू हो गया था. भारत में अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही थीं. उनका बॉम्बे पर कंट्रोल था और वे सप्लाई और प्रभाव के लिए सुरक्षित रास्ते चाहते थे. 18वीं सदी के आखिर में पश्चिमी और मध्य भारत में ताकतवर मराठा साम्राज्य, अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाओं और भारत को जीतने के लालच के बीच खड़ा था. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे भारतीय राज्यों पर कब्ज़ा कर रही थी. या तो उन्हें अपना सहयोगी बना रही थी या मौजूदा शासकों को हरा रही थी. प्लासी और बक्सर की लड़ाइयों के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई. ये दोनों लड़ाइयां पूर्वी भारत के ताकतवर राज्यों ने हारी थीं.
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अंग्रेजों ने शुरू किया राजनीतिक खेल
भारतीय शासकों के बीच अंदरूनी दुश्मनी ने अंग्रेजों को वह मौका दिया जिसकी उन्हें तलाश थी. उन्होंने इसका इस्तेमाल अपना कंट्रोल बढ़ाने के लिए किया. इलाहाबाद की संधि के बाद, मराठा साम्राज्य ब्रिटिश प्रभुत्व के खिलाफ खड़ा आखिरी बड़ी शक्ति बची थी. पेशवा की गद्दी मराठा सत्ता का केंद्र थी और यहीं से अंग्रेजों ने अपना अगला राजनीतिक खेल खेलना शुरू किया.
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1775 में सूरत की संधि
जब कंपनी ने रघुनाथराव के पेशवा बनने की कोशिश का समर्थन किया तो तनाव बढ़ गया. 1775 में सूरत की संधि पर साइन किए गए, जिसमें रणनीतिक किलों के बदले समर्थन का वादा किया गया था. मराठा नेता बहुत गुस्सा हुए. पेशवा के मंत्री और एक माहिर राजनीतिक रणनीतिकार नाना फडणवीस ने संधि का विरोध किया.
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फ्रांस ने दिया मराठाओं का साथ
18वीं सदी में, भारत कई विदेशी ताकतों के उदय का गवाह बन रहा था, क्योंकि यूरोपीय देश उपमहाद्वीप के बड़े हिस्सों पर कंट्रोल करना चाहते थे. फ्रांसीसी उन लोगों में से थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में मराठों का साथ दिया. नाना फडणवीस ने इसके बजाय फ्रांसीसियों की ओर रुख किया, जो लंबे समय से अंग्रेजों के दुश्मन थे और उन्हें पश्चिमी तट के एक बंदरगाह तक पहुंच दी.
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मराठाओं ने बनाई बेहतरीन रणनीति
ईस्ट इंडिया कंपनी के 3,900 सैनिक तोपखाना और सप्लाई के साथ पश्चिमी घाट को पार करते हुए पुणे की ओर बढ़े. उनसे रघुनाथराव के वफादार सैनिक भी जुड़ गए, जिससे उनकी संख्या तो बढ़ गई, लेकिन लॉजिस्टिक्स और मनोबल भी मुश्किल हो गया. जिस बात का अंग्रेजों ने अंदाज़ा नहीं लगाया था, वह थी मराठा जनरलों की रणनीतिक समझ.
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अंग्रेजों की तोड़ दी थी कमर
महादजी शिंदे और तुकोजी राव होल्कर ने अंग्रेजों का खुले मैदान में मुकाबला न करने का फैसला किया. इसके बजाय, उन्होंने उनकी सप्लाई चेन पर चोट किया. मराठों की घुड़सवार सेना चारों ओर से टूट पड़ी. उसने खाने और सप्लाई के सभी रास्ते काट दिए. इतिहासकार रिचर्ड एम ईटन ने 'द मराठा' (कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया) में लिखा है, 'इससे अंग्रेजों की चाल धीमी हो गई और उन्हें पीछे हटना पड़ा. घिरे हुए और थके हुए ब्रिटिश सैनिकों को वडगांव में रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा.
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1779 में हुआ वडगांव संधि क्या था?
वडगांव मावल के गांव वाले इसे सिर्फ़ एक सैन्य लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास के प्रतीक के रूप में याद करते हैं. खाना, पानी और मदद की कमी ने ब्रिटिश कमांडरों के पास बहुत कम विकल्प छोड़े थे. 16 जनवरी, 1779 को अंग्रेजों ने वडगांव की संधि पर साइन किए. यह एक ऐसा समझौता था जिसने उन्हें 1773 के बाद हासिल किए गए सभी इलाकों को मराठों को वापस करने और बंबई वापस जाने के लिए मजबूर किया.यह जीत हालांकि ज्यादा समय तक नहीं टिकी.
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बंगाल के गवर्नर ने खारिज कर दी संधि
बंगाल के गवर्नर-जनरल, वॉरेन हेस्टिंग्स ने यह कहते हुए तुरंत ही इस संधि को खारिज कर दिया कि बंबई के अधिकारियों के पास ऐसी शर्तों पर साइन करने का कोई अधिकार नहीं था. उन्होंने कर्नल थॉमस विंडहैम गोडार्ड के नेतृत्व में नई सेना भेजी, जिन्होंने जल्द ही मुख्य किलों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया और युद्ध जारी रखा जो आखिरकार 1782 में सालबाई की संधि के साथ खत्म हुआ.
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