क्या है चिल्ला-ए-कलां? जानें इस दौरान कश्मीर क्यों दिखती है जन्नत जैसी खूबसूरत
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चिल्ला-ए-कलां कश्मीर का सबसे कड़ाके की ठंड वाला 40 दिनों का दौर होता है, जो हर साल सर्दियों में आता है. इस दौरान तापमान शून्य से काफी नीचे चला जाता है, झीलें जमने लगती हैं और पूरी कश्मीर घाटी बर्फ की मोटी सफेद चादर से ढक जाती है.
Updated: January 15, 2026 7:59 PM IST
By Tanuja Joshi
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What is Chillai Kalan: कश्मीर घाटी में सर्दियों का मौसम अपने साथ एक खास पहचान लेकर आता है, जिसे चिल्ला-ए-कलां कहा जाता है. यह लगभग 40 दिनों का वह दौर होता है जब कश्मीर में ठंड अपने चरम पर होती है. आमतौर पर ये समय दिसंबर के आखिर से शुरू होकर जनवरी के आखिर तक रहता है. इस समय पूरी घाटी बर्फ की मोटी सफेद चादर में ढक जाती है और कश्मीर सचमुच जन्नत-सी नजर आने लगती है.
चिल्ला-ए-कलां के चलते कश्मीर में कड़ाके की ठंड और तेज हो गई, क्योंकि कई जिलों में न्यूनतम तापमान और गिर गया. लगातार बढ़ती ठंड के चलते लोग घरों में रहने को मजबूर हो गए, वहीं रोजमर्रा की गतिविधियां भी प्रभावित रहीं. मौसम विभाग ने 19 जनवरी से हल्की से मध्यम बर्फबारी की संभावना जताई है.
शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता तापमान
चिल्ला-ए-कलां के दौरान तापमान अक्सर शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है. रातों में पारा माइनस में पहुंच जाता है, जिससे झीलें और जलाशय जमने लगते हैं. श्रीनगर की मशहूर डल झील भी कई बार पूरी तरह जम जाती है. सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं और कई इलाकों का संपर्क अस्थायी रूप से कट जाता है. बिजली और पानी की आपूर्ति पर भी असर पड़ता है, जिससे लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.
हालांकि, इतनी कड़ी ठंड के बावजूद चिल्ला-ए-कलां कश्मीर की खूबसूरती को नई पहचान देता है. बर्फ से ढके पहाड़, देवदार के जंगल, सफेद छतों वाले घर और जमी हुई झीलें एक अद्भुत दृश्य पेश करती हैं. यही कारण है कि इस समय देश-विदेश से पर्यटक बड़ी संख्या में कश्मीर पहुंचते हैं. गुलमर्ग और पहलगाम जैसे पर्यटन स्थल बर्फीले खेलों और स्कीइंग के लिए खास आकर्षण बन जाते हैं.
स्थानीय लोगों के लिए चिल्ला-ए-कलां सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल का हिस्सा है. इस दौरान लोग पारंपरिक ‘कांगड़ी’ का इस्तेमाल करते हैं, जो ठंड से बचने का पारंपरिक तरीका है. साथ ही, सर्दियों के लिए पहले से ही ईंधन, राशन और जरूरी सामान जमा कर लिया जाता है. गर्म कपड़े और ऊनी शॉल कश्मीर की सर्दी की पहचान बन जाते हैं.
धीरे-धीरे कम होने लगता है असर
चिल्ला-ए-कलां के खत्म होने के बाद ठंड का असर धीरे-धीरे कम होने लगता है और इसके बाद चिल्ला-ए-खुर्द और चिल्ला-ए-बच्चा का दौर आता है. हालांकि ठंड बनी रहती है, लेकिन उसकी तीव्रता कम हो जाती है. कुल मिलाकर, चिल्ला-ए-कलां कश्मीर की सर्दियों का सबसे चुनौतीपूर्ण लेकिन सबसे खूबसूरत दौर माना जाता है, जो हर साल घाटी को एक अनोखी और यादगार पहचान देता है.
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Tanuja Joshi
हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक... तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी ... और पढ़ें
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