दुनिया की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी कौन सी है? चीन की इस यूनिवर्सिटी ने हावर्ड को पीछे छोड़ हासिल किया नंबर-1 का खिताब
Hindi Education 3World Best University In The World This Chinese University Surpassed Harvard To Become The Number One University दुनिया की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी कौन सी है? चीन की इस यूनिवर्सिटी ने हावर्ड को पीछे छोड़ हासिल किया नंबर-1 का खिताब
वर्ल्ड रैंकिंग में बड़ा उलटफेर करते हुए चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी ने हार्वर्ड को पीछे छोड़ दिया है. रिसर्च आउटपुट और भारी निवेश के दम पर चीनी संस्थान अब दुनिया के नए एजुकेशन हब बन रहे हैं.
Published: January 19, 2026 5:24 PM IST
By Satyam Kumar
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दुनिया के बेस्ट यूनिवर्सिटी की रैंकिंग में चीन के इन दो यूनिवर्सिटी झेजियांग और शंघाई जियाओ टोंग (Zhejiang and Shanghai Jiao Tong) का दबदबा. (पिक क्रेडिट: X)
World Universities Ranking: पिछले कई दशक से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी माना जाता रहा है, लेकिन अब वैश्विक शिक्षा की तस्वीर तेजी से बदल रही है. एक हालिया अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में बेहद चौंकाने वाला बदलाव सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया के शिक्षाविदों का ध्यान खींचा है. जहां पढ़ाई, रिसर्च और वैश्विक प्रतिष्ठा के मामले में हमेशा हार्वर्ड का नाम सबसे ऊपर लिया जाता था, वहीं अब चीन की यूनिवर्सिटीज रिसर्च के मापदंडों पर हार्वर्ड को कड़ी टक्कर ही नहीं दे रही हैं, बल्कि कई मामलों में उसे पीछे भी छोड़ चुकी हैं.
चीन की इन दो यूनिवर्सिटीज ने हासिल किया शीर्ष स्थान
हालिया वैश्विक रैंकिंग के अनुसार, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को पछाड़कर चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी (Zhejiang University) और शंघाई जिओ टोंग यूनिवर्सिटी (Shanghai Jiao Tong University) दुनिया की पहली और दूसरी सबसे टॉप यूनिवर्सिटी बनकर उभरी हैं. इसके साथ शिंघुआ और पेकिंग यूनिवर्सिटी भी रिसर्च आउटपुट के मामले में शीर्ष पायदान पर बनी हुई हैं.
आखिर क्यों नीचे आई हार्वर्ड की रैंकिंग?
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी कुछ रिसर्च से जुड़े मापदंडों पर गिरकर करीब 30वें स्थान पर पहुंच गई है. रैंकिंग में इस गिरावट का मुख्य कारण रिसर्च आउटपुट का स्थिर होना बताया जा रहा है, जहां हार्वर्ड का रिसर्च काम लगभग उसी स्तर पर बना हुआ है, वहीं चीनी यूनिवर्सिटीज का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर गया है. कई मामलों में ये चीनी संस्थान अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के मुकाबले हर साल 2 से 3 गुना ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित कर रहे हैं.
किस आधार पर तय होती है यूनिवर्सिटी की रैंकिंग?
विश्व यूनिवर्सिटी रैंकिंग केवल नाम के आधार पर तय नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कुछ ठोस वैज्ञानिक और शैक्षणिक मापदंड होते हैं,
रिसर्च पेपर की संख्या: हर साल इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित होने वाले शोध पत्रों की कुल संख्या, साइटेशन्स (Citations): उन रिसर्च पेपर्स को दुनिया भर के अन्य वैज्ञानिक अपने शोध में कितनी बार रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, वैज्ञानिक आउटपुट: साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मेडिकल (STEM) जैसे क्षेत्रों में किया गया कुल शोध, रिसर्च का प्रभाव (Impact): किया गया रिसर्च समाज और भविष्य की तकनीक पर कितना गहरा असर डाल रहा है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग: विदेशी संस्थाओं और ग्लोबल शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किए गए प्रोजेक्ट्स.
चीनी यूनिवर्सिटीज की सफलता का सीक्रेट
चीन की यह सफलता कोई रातों-रात हुआ करिश्मा नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले 20 सालों की कड़ी योजना और भारी निवेश है. चीन सरकार ने हायर एजुकेशन और रिसर्च में अरबों डॉलर का निवेश किया है. उनका खास फोकस AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), क्लीन एनर्जी, क्वांटम फिजिक्स और मेडिकल साइंस जैसे भविष्य के विषयों पर रहा है. इसके अलावा, वहां प्रोफेसरों के प्रमोशन और फंडिंग को उनके द्वारा प्रकाशित रिसर्च पेपर्स की संख्या से जोड़ दिया गया है, जिससे रिसर्च की रफ्तार में अभूतपूर्व तेजी आई है.
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के लिए बढ़ती चुनौतियां
रिपोर्ट के अनुसार, हार्वर्ड सहित अन्य अमेरिकी यूनिवर्सिटीज को वर्तमान में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. रिसर्च के लिए मिलने वाली सरकारी फंडिंग में अनिश्चितता, सख्त होते इमिग्रेशन नियम और विदेशी शोधकर्ताओं के साथ काम करने में आने वाली कानूनी बाधाएं मुख्य कारण हैं. इन वजहों से अमेरिका में रिसर्च की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है, जबकि चीन ने इन बाधाओं को दूर कर अपनी सीमाओं को ग्लोबल रिसर्चर्स के लिए खोल दिया है.
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क्या हार्वर्ड की प्रतिष्ठा खत्म हो गई है?
हालांकि रैंकिंग में गिरावट आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हार्वर्ड अभी भी कमजोर नहीं हुआ है. नए विचारों (Inovations), मानवतावादी विषयों और वैश्विक पहचान के मामले में हार्वर्ड आज भी दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड है, लेकिन जहां बात शुद्ध रूप से रिसर्च आउटपुट और डेटा की आती है, वहां चीनी यूनिवर्सिटीज ने अपनी संख्यात्मक ताकत से अमेरिका को पछाड़ दिया है.
दुनिया भर के छात्रों के लिए इसके मायने
इस बदलाव का सीधा मतलब यह है कि अब हायर एजुकेशन और बेहतरीन रिसर्च के लिए सिर्फ अमेरिका या यूरोप ही एकमात्र विकल्प नहीं रह गए हैं. चीन तेजी से वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र (Global Education Hub) बन रहा है. अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं को अब चीन, सिंगापुर और अन्य एशियाई देशों में भी बड़े मौके मिल रहे हैं.
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Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
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