'धीरे-धीरे निगल जाएगा हजारों हेक्टेयर रेगिस्तान...' भारत के दुश्मन ने खोजा ऐसा नीला और हरा 'जीव', जो बनाएगा ग्रेट ग्रीन वॉल-2
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Desert Geoengineering: चीन के वैज्ञानिकों ने रेगिस्तान की किस्मत बदलने वाली तकनीक खोज निकाली है. उन्होंने एक सूक्ष्म जीव साइनोबैक्टीरिया खोजा है जो एक नीले-हरे रंग की काई है. यह साइनोबैक्टीरिया ऐसा बदलाव ला सकते हैं जो अब तक संभव नहीं था. सायनोबैक्टीरिया फोटोसिंथेटिक माइक्रोऑर्गेनिज्म हैं जो पहली बार लगभग 3.5 बिलियन साल पहले दिखाई दिए थे.
चाइना साइंस डेली की रिपोर्ट के मुताबिक रेगिस्तान में पौधे हिलती रेत पर ज़िंदा नहीं रह सकते, लेकिन उत्तर-पश्चिम चीन के साइंटिस्ट साइनोबैक्टीरिया के जरिए रेगिस्तान को बदल रहे हैं.
यह आर्टिफिशियल “क्रस्टिंग” टेक्निक निंग्ज़िया हुई ऑटोनॉमस रीजन के एक रिसर्च स्टेशन के साइंटिस्ट्स ने डेवलप की है. यह नॉर्थ-वेस्ट चीन में टेंगर रेगिस्तान के किनारे पर है.
साइनोबैक्टीरिया के ये खास तौर पर चुने गए स्ट्रेन बहुत ज़्यादा गर्मी और सूखे में लंबे समय तक जिंदा रह सकते हैं. बारिश होती है, तो वे जिंदा हो जाते हैं. तेजी से फैलते हैं.
ये साइनोबैक्टीरिया रेत के ऊपर एक मजबूत, बायोमास से भरपूर परत बनाते हैं. यह परत टीलों को स्थिर करती है औरपौधों की ग्रोथ के लिए नींव बनाती है. रिसर्च स्टेशन के डिप्टी डायरेक्टर झाओ यांग, जिन्होंने टीम को लीड किया, ने बताया कि उन्होंने स्थिर रेत की सतहों पर नीले-हरे काई को जमा होने में मदद की है. यह धीरे-धीरे मिट्टी के कणों से जुड़कर मिट्टी के ढेलों जैसा एक क्रस्ट जैसा स्ट्रक्चर बनाता है – जिसे साइंटिस्ट “सायनोबैक्टीरियल क्रस्ट” कहते हैं. यह क्रस्ट एक “इकोलॉजिकल स्किन” की तरह काम करता है जो रेतीले इलाके को ढकता है और 36km/h (22mph) तक की हवा झेल सकता है.
इंसानी इतिहास में यह पहली बार है कि कुदरती जमीन को नया आकार देने के लिए माइक्रोब्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
उम्मीद है कि अगले पांच सालों में इस टेक्निक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर रेगिस्तान के लगभग 5,333-6,667 हेक्टेयर हिस्से को ट्रीट करने के लिए किया जाएगा. (photo credit AI, for representation only)
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