पर्यावरणीय चुनौतियां:साल 2025 क्यों बना अब तक का सबसे गर्म ला नीना वर्ष? - 2025 Was One Of The Warmest La Nina Years On Record Affects Of Accumulation Of Heat-trapping Greenhouse Gases

पर्यावरणीय चुनौतियां:साल 2025 क्यों बना अब तक का सबसे गर्म ला नीना वर्ष? - 2025 Was One Of The Warmest La Nina Years On Record Affects Of Accumulation Of Heat-trapping Greenhouse Gases

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साल 2025 जलवायु इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हुआ है, जिसने वैज्ञानिकों की दशकों पुरानी समझ को भी चुनौती दे दी। जिस ला नीना को आमतौर पर वैश्विक तापमान को कुछ हद तक संतुलित करने वाली ठंडी जलवायु अवस्था माना जाता है, उसी की मौजूदगी में धरती ने असामान्य और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेली। बर्कले अर्थ के विस्तृत विश्लेषण के अनुसार 2025 न केवल रिकॉर्ड में तीसरा सबसे गर्म वर्ष रहा, बल्कि अब तक का सबसे गर्म ला नीना वर्ष भी साबित हुआ। इस गर्मी का सीधा असर दुनिया की करीब 77 करोड़ आबादी पर पड़ा, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अब तक का सबसे गर्म साल अनुभव किया।

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आखिर क्या है ला नीना और इससे क्या उम्मीद की जाती है?

ला नीना, अल नीनो दक्षिणी दोलन यानी ईएनएसओ प्रणाली की ठंडी अवस्था है। यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र सतह के सामान्य से ठंडा होने के कारण बनती है। परंपरागत रूप से इसका असर यह होता है कि वैश्विक औसत तापमान में कुछ हद तक गिरावट आती है,खासकर तब जब इससे पहले अल नीनो जैसी गर्म अवस्था सक्रिय रही हो। इसी कारण वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि 2025 में गर्मी का दबाव कुछ कम होगा। विज्ञापन विज्ञापन

2025 में यह उम्मीद क्यों टूट गई?

बर्कले अर्थ की ग्लोबल टेम्परेचर रिपोर्ट 2025 बताती है कि साल की शुरुआत और अंत दोनों ही चरणों में ला नीना की स्थिति मौजूद थी। दिसंबर 2024 में यह विकसित हुई और मार्च 2025 तक बनी रही। अप्रैल में हालात तटस्थ हुए, जबकि सितंबर 2025 में ला नीना ने दोबारा वापसी की। इसके बावजूद धरती का औसत तापमान सामान्य से 1.44 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। यह स्तर 2024 और 2023 के बाद तीसरा सबसे ऊंचा है। यानी जिस ला नीना से ठंडक की उम्मीद थी, वह इस बार वैश्विक गर्मी को रोक पाने में लगभग असफल रहा। वैज्ञानिक इसे संकेत मानते हैं कि अब वैश्विक तापमान केवल ईएनएसओ जैसे प्राकृतिक चक्रों से नियंत्रित नहीं हो रहा।

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में पृथ्वी की 9.1 फीसदी सतह ने अब तक का सबसे अधिक वार्षिक औसत तापमान दर्ज किया। इसमें 10.6 फीसदी भूभाग ऐसे रहे जहां रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी, जबकि 8.3 फीसदी महासागरीय क्षेत्र भी अपने इतिहास के सबसे गर्म स्तर तक पहुंच गए। खास बात यह रही कि यह गर्मी उन क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित रही जहां दुनिया की बड़ी आबादी रहती है, जिससे इसके सामाजिक, स्वास्थ्य और आर्थिक असर और गंभीर हो गए।


बर्कले अर्थ के अनुसार दुनिया की करीब 8.5 फीसदी आबादी यानी लगभग 77 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां 2025 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा। इसका सबसे बड़ा प्रभाव एशिया में देखा गया। वैज्ञानिकों के लिए यह तथ्य इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से में 2025 को रिकॉर्ड का सबसे ठंडा साल नहीं पाया गया। यह वैश्विक स्तर पर गर्मी के असंतुलन को दर्शाता है।

लगातार 11 साल और हर साल नया रिकॉर्ड

कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस और बर्कले अर्थ दोनों के विश्लेषण इस बात पर सहमत हैं कि पिछले 11 साल रिकॉर्ड में दर्ज 11 सबसे गर्म साल रहे हैं। इनमें 2023, 2024 और 2025 अब तक के तीन सबसे गर्म वर्ष साबित हुए। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2025 पिछले 176 वर्षों के जलवायु इतिहास के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल है। इस दौरान वैश्विक सतही औसत तापमान औद्योगिक काल (1850–1900) से पहले की तुलना में 1.44 (± 0.13) डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।

डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2023, 2024 और 2025 इन तीनों वर्षों का औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.48 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। यह आंकड़ा 1.5 डिग्री सेल्सियस की उस सीमा के बेहद करीब है, जिसे पार करना जलवायु संतुलन के लिए गंभीर खतरा माना जाता है। कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के मुताबिक 2023 से 2025 के बीच का औसत तापमान इस सीमा को अस्थायी रूप से पार भी कर चुका है।

ला नीना में भी क्यों तपते रहे महासागर

गर्मी का सबसे खतरनाक संकेत महासागरों से मिला। एडवांसेज इन एटमोस्फियरिक साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि 2025 में महासागरों में जमा ऊष्मा रिकॉर्ड स्तर के करीब रही। 2024 से 2025 के बीच समुद्र की ऊपरी 2000 मीटर परत में करीब 23 जेटाजूल अतिरिक्त गर्मी जमा हुई। दुनिया के लगभग 33 फीसदी महासागर क्षेत्र अपने इतिहास के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहे, जबकि 57 फीसदी क्षेत्र शीर्ष पांच सबसे गर्म स्थितियों में पाए गए।उष्णकटिबंधीय अटलांटिक, भूमध्य सागर, उत्तर हिंद महासागर और दक्षिणी महासागर इस गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे।

वैज्ञानिक किस बात से सबसे ज्यादा चिंतित हैं?

वैज्ञानिकों का कहना है कि 2023 से 2025 के बीच तापमान में आई तेज छलांग यह संकेत देती है कि अब भविष्य की गर्मी का अनुमान केवल पुराने रुझानों या प्राकृतिक चक्रों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। कुछ नए, जटिल और अब भी पूरी तरह समझ में न आए कारक हाल के वर्षों में तापमान को तेजी से बढ़ा रहे हैं।

ला नीना जैसी ठंडी जलवायु घटनाओं के बावजूद धरती और महासागरों का लगातार तपना यह साफ संकेत देता है कि जलवायु संकट अब कोई अस्थायी या असाधारण स्थिति नहीं रहा। वैज्ञानिकों की नजर में यह अब न्यू नॉर्मल बनता जा रहा है। एक ऐसी वास्तविकता, जहां अत्यधिक गर्मी भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान का स्थायी सच बनती जा रही है।



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