3 बच्चों के मां-पिता भी लड़ सकेंगे निकाय-पंचायत चुनाव, इस राज्य में 30 साल पुराना नियम होगा खत्म?
Hindi India HindiRajasthan May End Three Child Rule For Panchayat And Municipal Elections 3 बच्चों के मां-पिता भी लड़ सकेंगे निकाय-पंचायत चुनाव, इस राज्य में 30 साल पुराना नियम होगा खत्म?
इस राज्य में निकाय और पंचायत चुनावों से जुड़ा 30 साल पुराना कानून खत्म करने की तैयारी है, जिससे अब तीन बच्चों वाले माता-पिता भी चुनाव लड़ सकेंगे. इससे पहले दो-बच्चे की शर्त के कारण कई लोग चुनाव से वंचित हो जाते थे, लेकिन नए फैसले से लोकतांत्रिक भागीदारी का दायरा बढ़ने की उम्मीद है.
Published: January 14, 2026 4:37 PM IST
By Tanuja Joshi
| Edited by Tanuja Joshi
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राजस्थान की राजनीति में जल्द ही एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है. भजनलाल सरकार पंचायत और नगर निकाय चुनावों से जुड़े उस कानून में संशोधन की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसने बीते तीन दशकों से लाखों लोगों को चुनाव लड़ने से रोके रखा. संकेत हैं कि राज्य में लागू दो-संतान की अनिवार्यता अब इतिहास बनने वाली है और तीन संतान वाले माता-पिता को भी चुनावी मैदान में उतरने का मौका मिल सकता है.
सूत्रों के मुताबिक, करीब 30 साल पुराने इस प्रावधान में बदलाव के लिए सरकार आगामी विधानसभा बजट सत्र में विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है. अगर ये विधेयक पारित हो जाता है, तो पंचायत और निकाय चुनावों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. माना जा रहा है कि इस कदम से स्थानीय राजनीति में भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र का दायरा और व्यापक होगा.
कानून में बदलाव
दरअसल, पहले सरकार 1994 के पंचायती राज अधिनियम और 2009 के नगरपालिका अधिनियम में अध्यादेश के जरिए संशोधन करने पर विचार कर रही थी. हालांकि, तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी. अब भजनलाल सरकार ने सीधे विधानसभा के रास्ते कानून में बदलाव का फैसला किया है. पंचायती राज विभाग और नगरीय विकास विभाग अपने-अपने स्तर पर संशोधन का मसौदा तैयार कर चुके हैं, जिसे विधि विभाग को भेजा जा चुका है. जल्द ही इन ड्राफ्ट्स को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है.
मौजूदा व्यवस्था की बात करें तो राजस्थान में 27 नवंबर 1995 से यह नियम लागू है कि तीन या उससे अधिक संतान वाले माता-पिता पंचायत और नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते. इस नियम के तहत पंच, सरपंच, उपसरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान, प्रमुख, पार्षद, सभापति और महापौर जैसे अहम पद शामिल हैं. इतना ही नहीं, अगर कोई प्रत्याशी गलत जानकारी देकर चुनाव जीत लेता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई और जेल तक का प्रावधान भी कानून में दर्ज है.
समय के साथ इस प्रावधान को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. आलोचकों का तर्क है कि यह नियम जनसंख्या नियंत्रण से ज्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करता है, खासकर ग्रामीण और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए. वहीं, समर्थकों का कहना रहा है कि इससे परिवार नियोजन को बढ़ावा मिला. अब सरकार का रुख बदलता नजर आ रहा है. अगर संशोधन होता है, तो यह न केवल कानून में बड़ा बदलाव होगा, बल्कि स्थानीय राजनीति में नई ऊर्जा और नए चेहरों की एंट्री का रास्ता भी खोलेगा. आने वाले बजट सत्र पर अब सबकी नजरें टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि राजस्थान की स्थानीय राजनीति किस नई दिशा में आगे बढ़ने वाली है.
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Tanuja Joshi
हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक... तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी ... और पढ़ें
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