डोगरा आर्ट म्यूजियम की धरोहर:ताड़ के 324 पत्तों पर देवनागरी में स्कंद पुराण, भविष्य में होगा ऑनलाइन उपलब्ध - The Skanda Purana Written In Devanagari Script On 324 Palm Leaves.
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जम्मू के प्रसिद्ध डोगरा आर्ट म्यूजियम में कई अनमोल धरोहरें हैं लेकिन ताड़ के 324 पत्तों पर लिखा स्कंद पुराण बेहद खास है। यह पांडुलिपि नौवीं सदी की है। शीशे के बॉक्स में काफी करीने से रखे इस पुराण को दशकों तक और सुरक्षित रखने के लिए प्रयास शुरू हो गया है।
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देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1954 में डोगरा आर्ट म्यूजियम का उद्घाटन किया था। म्यूजियम के पांडुलिपि सेक्शन में 694 बेशकीमती पांडुलिपियां मौजूद हैं। इन सबके बीच देवनागरी लिपि में लिखित स्कंद पुराण दर्शकों को आकर्षित करता है।
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यह इसलिए भी खास है क्योंकि 324 पत्तों पर 81,000 से ज्यादा श्लोक लिखे गए हैं। यह शैव साहित्य का हिस्सा है जिसमें शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का बखान है। कार्तिकेय को स्कंद नाम से भी जाना जाता है। 18 हिंदू पुराणों में से स्कंद पुराण सबसे बड़ा है।
बेहतर संरक्षण का शुरू हुआ प्रयास, ऑनलाइन भी होगा
म्यूजियम के प्रभारी मुकुल मंगोत्रा बताते हैं कि स्कंद पुराण को शीशे के बॉक्स में सुरक्षित रखने के लिए सिलिका जेल और कीटाणुनाशक रसायन का छिड़काव किया गया है। इसे बेहतर ढंग से दशकों तक सुरक्षित रखने के लिए कश्मीर यूनिवर्सिटी के आर्कियोलाॅजी डिपार्टमेंट से मदद लेने की बात चल रही है। इसे ऑनलाइन किया जाएगा ताकि देश-विदेश में कहीं से कोई भी इसे देख और पढ़ सके।
मुल्ला मसीह की लिखी रामायण, महाभारत और पांडवगीता भी यहां मौजूद कश्मीर के प्रसिद्ध स्थलों का वर्णन करने वाली भोजपत्र पर शारदा लिपि में लिखित पांडुलिपि भी म्यूजियम में रखी हुई है। फारसी में मुल्ला मसीह लिखित 18वीं सदी की रामायण, भागवत पुराण, महाभारत, पांडवगीता और लंकाकांड समेत अन्य ग्रंथ भी मौजूद हैं।
स्कंद पुराण को माना जाता है जीवंत ग्रंथ
स्कंद पुराण नाम का मूल ग्रंथ संभवतः 8वीं सदी तक मौजूद था। समय के साथ यह अनेक संस्करणों और पाठों में विभाजित हो गया। इसे एक जीवंत ग्रंथ माना जाता है जिसका कई शताब्दियों में व्यापक संपादन हुआ है।