50 करोड़ का आश्रम, 7.5 करोड़ की कारें...योगी आदित्यनाथ से करीबी, सतुआ बाबा के बनने की कहानी - satua baba in 2026 magh mela prayagraj 50 crore ashram 7 crore more land rover defender, porsche 911 turbo cars related to yogi adityanath and controversies
जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते हैं, उस उम्र यानी 11 साल की उम्र में उन्होंने घर-परिवार छोड़ दिया था। आज वह सतुआ बाबा के नाम से जाने जाते हैं। ललितपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मे सतुआ बाबा का शुरुआती नाम संतोष तिवारी हुआ करता था। बाबा बने तो संतोष दास हो गए, मगर सतुआ खाने-खिलाने के चलते वह लोगों के बीच सतुआ बाबा कहलाने लगे। इन दिनों सतुआ बाबा माघ मेले में छाए हुए हैं। सतुआ बाबा वाराणसी में विष्णुस्वामी संप्रदाय के प्रमुख हैं। मंडे मोटिवेशन में जानते है इनकी कहानी।
बड़े भाई ने सतुआ आश्रम में दिलाया था प्रवेश
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सतुआ बाबा शोभाराम तिवारी और राजा बेटी तिवारी के चार बच्चों में सबसे छोटे हैं। बताया जाता है कि जब उनका पारंपरिक स्कूली शिक्षा में मन नहीं लगा तो आध्यात्मिक शिक्षा हासिल करने के लिए 11 से 13 वर्ष की आयु के बीच घर छोड़ दिया था। उनके बड़े भाई महेश तिवारी उन्हें वाराणसी के मणिकर्णिका घाट ले गए, जहां उन्हें मुख्य पुजारी यमुनाचार्य महाराज के मार्गदर्शन में विष्णु स्वामी संप्रदाय या सतुआ आश्रम में प्रवेश दिया गया। संतोष जल्द ही धार्मिक अध्ययन में लीन हो गए और एक प्रिय शिष्य बन गए।
2012 में सतुआ आश्रम के प्रमुख बने संतोष दास
लगभग 2005 में संतोष दास ने औपचारिक रूप से सांसारिक जीवन का त्याग कर संन्यास ले लिया। उनके गुरु ने जीवित रहते ही उन्हें महामंडलेश्वर और उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था और 2011 में यमुनाचार्य महाराज के निधन के बाद संतोष ने विष्णु स्वामी संप्रदाय का नेतृत्व संभाला। 2012 में, वे इसके 57वें आचार्य बने और उन्हें 'सत्तू बाबा' की उपाधि प्राप्त हुई। यह उपाधि आश्रम के 'पीठाधीश्वर' या मुख्य पुजारी को दी जाती है और इसकी परंपरा 1990 के दशक के उत्तरार्ध से चली आ रही है, जब आश्रम आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। उस समय, आश्रम के पुजारियों को पोषण के लिए सत्तू का सेवन करना पड़ता था।
कारों, ब्रांडेड चश्मे पर खूब हुई चर्चा
सतुआ बाबा को काशी विश्वनाथ का प्रतिनिधि भी कहा जाता है। उन्हें महाकुंभ 2025 के दौरान जगद्गुरु की उपाधि मिली थी। माघ मेले के दौरान सतुआ बाबा को आश्रम बनाने के लिए सबसे ज्यादा जमीन आवंटित की गई। मगर, उनकी चर्चा तब और ज्यादा हुई, जब उनकी पोर्श 911 टर्बो (कीमत करीब 4.4 करोड़ रुपये बताई जा रही है) और लैंड रोवर डिफेंडर (कीमत लगभग 3 करोड़ रुपये) की तस्वीरें वायरल हुईं। उनके शिविर के बाहर खड़ी इन गाड़ियों की तस्वीरें, उनके भगवा वस्त्र, ब्रांडेड धूप के चश्मे और उपस्थित उच्च-स्तरीय मेहमानों के साथ सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुईं, जिससे आलोचना और समर्थन दोनों ही देखने को मिले।
योगी आदित्यनाथ भी कर चुके हैं तारीफ
हाल ही में सतुआ बाबा को धार्मिक और राजनीतिक हलकों में भी खूब लोकप्रियता मिली। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सनातन धर्म और आध्यात्मिक एकता को बढ़ावा देने के लिए सतुआ बाबा की सार्वजनिक रूप से तारीफ की। महाकुंभ 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित वरिष्ठ संतों और राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति में उन्हें जगद्गुरु की उपाधि प्रदान की गई।
बनारस का आश्रम 50 करोड़ का
कभी सादगी के लिए मशहूर सतुआ पीठ के पास अब उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत कई राज्यों में संपत्तियां हैं। अकेले बनारस स्थित आश्रम की कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। सतुआ बाबा का कहना है कि ये संपत्तियां धार्मिक उद्देश्यों के लिए रखी गई हैं। इसके अलावा, सतुआ बाबा के पास लग्जरी कारों का शानदार संग्रह है और उन्हें अक्सर रे-बैन के धूप के चश्मे पहने देखा जा सकता है।
सतुआ बाबा की नेटवर्थ कितनी है
जी न्यूज के अनुसार, सतुआ बाबा की कुल संपत्ति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन खबरों के अनुसार उनकी कारों का संग्रह 10 करोड़ रुपये से अधिक का है। अनुमानों के मुताबिक, यदि संप्रदाय, उसकी जमीन और अन्य संपत्तियों को मिलाकर देखा जाए, तो सतुआ बाबा की कुल संपत्ति 15 से 30 करोड़ रुपये या उससे भी अधिक हो सकती है।
योगी आदित्यनाथ और केशव मौर्य के बीच सतुआ बाबा
भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, सतुआ बाबा का उदय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच लंबे समय से चल रहे राजनीतिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है। 24 दिसंबर 2025 को डीएम मनीष वर्मा ने माघ मेला निरीक्षण के दौरान सतुआ बाबा के आश्रम का दौरा किया। उन्होंने आश्रम में चूल्हे पर रोटियां बनाईं, जिसे सतुआ बाबा ने देखा। छह दिन बाद, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने डीएम को सलाह दी कि ज्यादा सतुआ बाबा की रोटी के चक्कर में मत पड़ो, व्यवस्था को ठीक करो। इस घटना पर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा हुई है।