' रोज 66 रुपये मिलते हैं, उसे बढ़ाकर 400 किया जाए', रसोइयां का सरकार के खिलाफ 22 दिनों से आंदोलन - we get 66 rupees a day, it should be increased to 400 cooks protest against the government for 22 days

' रोज 66 रुपये मिलते हैं, उसे बढ़ाकर 400 किया जाए', रसोइयां का सरकार के खिलाफ 22 दिनों से आंदोलन - we get 66 rupees a day, it should be increased to 400 cooks protest against the government for 22 days
रायपुर:

मजदूरी बढ़ाने के लिए के मध्यान्ह भोजन बनाने वाले रसोइयां 22 दिन से हड़ताल कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने वाले हजारों रसोइयों की मांग है कि 66 रुपये प्रतिदिन से बढ़ाकर 400 रुपये किया जाए। आंदोलनकारियों में लगभग 95 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें से कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की हैं।


कांग्रेस सरकार ने बढ़ाया था पैसा

उनका कहना है कि उनकी मेहनत से स्कूलों में पढ़ने वालों बच्चों को भोजन तो मिल रहा है, लेकिन उनके अपने घर मुश्किल में हैं। आंदोलन में शामिल होने के लिए कांकेर जिले से आईं सविता मानिकपुरी ने पूछा, 'सरकार हमारी ज़िंदगी के साथ क्यों खेल रही है?' दूधावा गांव के एक सरकारी मिडिल स्कूल में 2011 से रसोइए के रूप में कार्यरत मानिकपुरी याद करती हैं कि उन्होंने एक हजार रुपए मासिक मानदेय पर काम शुरू किया था, जिसे पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान बढ़ाकर दो हजार रुपए कर दिया गया था।
मानिकपुरी ने बताया, 'सरकारें बदलती हैं, लेकिन हमारी हालत नहीं बदलती। हम 66 रुपये की दिहाड़ी में कैसे गुजारा करें?' उन्होंने कहा, 'मेरे दो बच्चे हैं। मेरी बेटी ने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली है, लेकिन मैं उसे कॉलेज भेजने का खर्च नहीं उठा सकती। मेरा बेटा 11वीं क्लास में है। उसके सपने हैं। मुझे नहीं पता कि मैं उन्हें कैसे पूरा कर पाऊंगी।'


87 हजार रसोइए काम करते हैं

संघ के सचिव मेघराज बघेल ने बताया कि राज्य में मध्यान्ह भोजन योजना के तहत लगभग 87 हजार रसोइए काम करते हैं और 29 दिसंबर से वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। उनका दावा है कि ज्यादातर सरकारी स्कूलों में खाने की सेवाएं बाधित हुई हैं। बघेल ने बताया कि रसोइयों के समूह जिलों से आते हैं, कुछ दिनों तक आंदोलन स्थल पर रहते हैं और फिर घर लौट जाते हैं, जिनकी जगह दूसरे लोग ले लेते हैं।

सचिव के अनुसार किसी भी दिन छह हजार से सात हजार रसोइए विरोध प्रदर्शन में बैठे रहते हैं। बघेल ने बताया कि वह अक्टूबर 1995 में इस योजना के शुरू होने के बाद से इससे जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया, “हमने 15 रुपये प्रतिदिन से शुरुआत की थी। 30 साल बाद भी हम 66 रुपये पर ही हैं। हमारी मांग सीधी है — हमें कलेक्टर रेट के हिसाब से भुगतान किया जाए, जो लगभग 440 रुपये प्रतिदिन है।”

राज्य सरकार ने रसोइयों के लिए कुछ नहीं किया

उन्होंने दावा किया, ''राज्य सरकार ने रसोइयों के लिए कुछ नहीं किया है। वह सिर्फ दो हजार रुपये मासिक वेतन दे रही है, वह भी साल में सिर्फ 10 महीने के लिए। इसके उलट, दूसरे राज्यों में इसी काम के लिए रसोइयों को काफी ज़्यादा वेतन मिलता है - पुडुचेरी में 21 हजार रुपये प्रति माह, केरल में 12 हजार रुपये, लक्षद्वीप में छह हजार, मध्यप्रदेश और हरियाणा में चार हजार रूपए। इस बढ़ती महंगाई में गुजारा करना मुश्किल होता जा रहा है।''

हमारी नौकरी पक्की नहीं है

आंदोलनरत रसोइयों का कहना है कि उनकी नौकरियां पक्की नहीं हैं। प्रदर्शन में कई महिलाएं धुएं के कारण होने वाली लंबे समय की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में बात करती हैं, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में गैस सिलेंडर की सुविधा न होने के कारण अक्सर लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया जाता है। महिलाओं का कहना है कि जब तक सरकार उनकी बात नहीं सुनती, वे विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगी।

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