केंद्र में आईपीएस अफसरों की संख्या में इजाफा:छह माह पहले थे 678 पद, अब Ips अफसर हुए 700 के पार - Increase In Number Of Ips Officers In Centre Now Number Of Ips Officers Has Crossed 700

केंद्र में आईपीएस अफसरों की संख्या में इजाफा:छह माह पहले थे 678 पद, अब Ips अफसर हुए 700 के पार - Increase In Number Of Ips Officers In Centre Now Number Of Ips Officers Has Crossed 700

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केंद्र सरकार में विभिन्न राज्यों से प्रतिनियुक्ति पर आने वाले 'आईपीएस' अधिकारियों के लिए स्वीकृत पदों की संख्या में इजाफा किया गया है। जून 2025 में 678 आईपीएस अधिकारी, केंद्र में तैनात थे। अब यह संख्या, 700 के पार पहुंच गई है। पिछले साल जून की रिपोर्ट के अंतर्गत 15 डीजी, 12 एसडीजी, 26 एडीजी, 150 आईजी, 254 डीआईजी और 221 एसपी के पद स्वीकृत थे। वहीं 23 दिसंबर 2025 में आईपीएस 'प्रतिनियुक्ति' के लिए स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ा दी गई। फिलहाल, केंद्र में डीजी के 15 पद, एसडीजी के 17 पद, एडीजी के 30 पद, आईजी के 158 पद, डीआईजी के 256 पद और एसपी के 225 पद स्वीकृत किए गए हैं। खास बात है कि केंद्र  में बतौर प्रतिनियुक्ति, आईपीएस के स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाए जाने के बाद भी 212 पद खाली पड़े हैं।  

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केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित सेवा का दर्जा' देने और कैडर अधिकारियों के दूसरे हितों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में एक अहम फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया कि इन बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) सही मायने में लागू हो। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में केवल एनएफएफयू (नॉन फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन) के लिए नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए 'ओजीएएस पैटर्न' लागू किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने इसके लिए छह माह की समय-सीमा भी तय की थी। 'कैडर रिव्यू', यह भी इसी अवधि में करने के लिए कहा गया। सुनवाई में यह बात सामने आई कि आईपीएस के चलते कैडर अधिकारी, पदोन्नति में पिछड़ जाते हैं। उन्हें नेतृत्व का अवसर नहीं मिल पाता। 23 मई, 2025 के फैसले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को एसएजी (वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड) स्तर तक के पदों पर आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को अगले दो साल में धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया था।  विज्ञापन विज्ञापन

आईपीएस अधिकारियों के चलते केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैडर अधिकारियों की पदोन्नति में ठहराव और उच्च पदों पर आईपीएस की लगातार नियुक्ति से उनके करियर की प्रगति में बाधा आ रही है। इसे लेकर कैडर अफसरों में असंतोष था। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। गत वर्ष 28 अक्तूबर को सर्वोच्च अदालत में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बैंच द्वारा रिव्यू पिटीशन को डिसमिस कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए। दूसरी तरफ गत छह माह के दौरान केंद्र में आईपीएस प्रतिनियुक्ति में तेजी दिखाई दी। 

बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, पुलिस अधिकारी, अपने राज्य को छोड़कर केंद्रीय बलों में प्रतिनियुक्ति पर आ जाते हैं। ऐसे में पुलिस अधिकारियों को काम करने का तरीका मालूम नहीं होता। वे पुलिस के मुताबिक, इन बलों को चलाने का प्रयास करते हैं। 1986 से सरकार ने इन्हें ओजीएएस माना था। 2006 में वेतन आयोग ने इन्हें एनएफएफयू देने का समर्थन किया। इसे भी लागू नहीं किया गया। नतीजा, कैडर अफसरों न तो समय पर पदोन्नति मिल सकी और न ही वित्तीय फायदे। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और दूसरे बलों में बहुत पदोन्नति को लेकर हालात खराब होते चले गए। कैडर अफसर, 15 साल में पहली पदोन्नति नहीं पा सके। इस रफ्तार से तो वे कमांडेंट से ही रिटायर हो जाएंगे। दो तीन सौ अफसरों में से एक आध ही एडीजी बन सकेगा। 

सीआरपीएफ के पूर्व सहायक कमांडेंट एवं अधिवक्ता सर्वेश त्रिपाठी कहते हैं 2015 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कैडर अफसरों के हक में फैसला दिया तो सरकार उसके खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में चली गई। 2019 में सरकार की एसएलपी डिसमिस हो गई। सर्वोच्च अदालत ने कहा, इन बलों के कैडर अफसर, ओजीएएस के हकदार हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे खत्म किया जाना चाहिए। इन बलों में पहले सैन्य अधिकारी भी प्रतिनियुक्ति पर आते थे, लेकिन बाद में उस पहल को बंद कर दिया गया। आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को नहीं रोका जा सका। अब आईपीएस की प्रतिनियुक्ति बंद होनी चाहिए। वजह, आईपीएस के चलते कैडर अधिकारी, पदोन्नति में पिछड़ जाते हैं। उन्हें नेतृत्व का अवसर नहीं मिल पाता। डेढ़ दशक में पदोन्नति नहीं मिल रही। कंपनी कमांडर को शीर्ष पदों पर काम करने का अवसर दिया जाए।

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