ओवैसी का चेहरा और बीजेपी वाला 'पैटर्न', AIMIM अब सिर्फ हैदराबाद की पार्टी नहीं रही - asaduddin owaisi s face and bjp like pattern aimim is no longer just a party of hyderabad
मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) करीब एक दशक पहले तक पुराने हैदराबाद तक सीमित पार्टी मानी जाती थी। लेकिन, आज असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी देश के बड़े हिस्से में पहुंच चुकी है। ओवैसी की पार्टी का विकास कुछ-कुछ बीजेपी के पैटर्न पर हो रहा है। अलबत्ता दोनों की प्रगति में कोई तुलना नहीं है, लेकिन एआईएमआईएम भी एक चेहरे के दम पर पूरे भारत की मुसलमानों की पार्टी बनने लगी है। इसके पीछे चेहरा हैदराबाद के सांसद और पार्टी चीफ असदुद्दीन ओवैसी का है। वह देश में जहां भी जा रहे हैं, मुसलमानों का एक वर्ग उन्हें अपनी उम्मीद मानने लगा है।
ओवैसी की पार्टी का तेजी से हो रहा विस्तार
हाल में संपन्न हुए महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने खुद को एक नई उभरती ताकत के रूप में पेश किया है। वैसे महाराष्ट्र से एआईएमआईएम को पिछली लोकसभा में भी एक सीट भी मिल चुकी है। लेकिन, अबकी बार 13 नगर निगमों में एआईएमआईएम के 126 कॉर्पोरेटरों की जीत बहुत कुछ कह रहा है। ओवैसी की पार्टी का जनाधार बढ़ रहा है। देश की राजनीति में यह बदलाव कुछ तब से दिखने लगा है, जब से 2014 के बाद बीजेपी का नए अवतार में विस्तार शुरू हुआ है और स्थिति 'चप्पे-चप्पे भाजपा' वाली हो चुकी है।
ओवैसी एआईएमआईएम का सबसे बड़े चेहरा
एआईएमआईएम में ओवैसी एकमात्र चेहरा हैं, जो हैदराबाद ओल्ड सिटी से लेकर पूरे देश में पहचाने और सुने जाते हैं। ओवैसी को सुनने वालों में उनके प्रशंसक युवा मुसलमान ही नहीं, उनके कट्टर विरोधी भी होते हैं, जो उन्हें उनके विवादास्पद भाई अकबरुद्दीन ओवैसी से अलग बनाता है। जब राष्ट्रीय मसला होता है तो ओवैसी सरकार की ओर से भारत का पक्ष रखने के लिए विदेश भी पहुंच जाते हैं और बात भारतीय मुसलमानों की हो रही हो तो अन्य मुस्लिम देश को भी भाव देना पसंद नहीं करते। कहने का अर्थ ये है कि एआईएमआईएम के विधायक अगर दो बार से बिहार में चुने जा रहे हैं, यूपी और दिल्ली चुनावों में भी इनकी पार्टी अपनी छाप छोड़ चुकी है या फिर अब महाराष्ट्र में नया धमाका किया है, तो उन सबके पीछे खुद ओवैसी सबसे बड़ी वजह हैं।
हैदराबाद से निकले के बाद ओवैसी का बढ़ता कद
एआईएमआईएम का मूल वजूद आज भी हैदराबाद में है, जिसका आकार अब धीरे-धीरे तेलंगाना में भी बढ़ना शुरू हो चुका है। राज्य में एआईएमआईएम के 7 एमएलए, 2 एमएलसी, 67 निगम पार्षद और 70 पार्षद हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार से एआईएमआईएम को 5 सीटें मिल रही हैं। इस बार कांग्रेस ने आरजेडी से हाथ मिलाकर भी 6 सीटें जीती है। महाराष्ट्र के निगम चुनाव में शरद पवार की एनसीपी के मुकाबले ओवैसी की पार्टी तीन गुना मजबूत रही है तो उद्धव ठाकरे की शिवसेना को इससे करीब 30 ही अधिक सीटें मिली हैं। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इसे मालेगांव सेंट्रल सीट भी मिल चुकी है।
बीजेपी-विरोधी दलों के लिए बड़ी चिंता बने ओवैसी
ओवैसी की पार्टी देश में किस तरह से राजनीतिक धमक दे रही है, इसका उदाहरण 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव भी है। पार्टी का यहां एक भी उम्मीदवार नहीं जीता, लेकिन करीब 40% मुस्लिम आबादी वाली मुस्तफाबाद सीट बीजेपी 17,578 वोटों से इसलिए जीत गई, क्योंकि यहां एआईएमआईएम को 33,474 वोट मिल गए। ओवैसी की वजह से मुस्लिम वोट बैंक खिसकना बीजेपी-विरोधी दलों के लिए अब बहुत बड़ी चिंता की वजह बन चुकी है।
कांग्रेस के बाद ओवैसी सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा !
यह पैटर्न 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी दिख चुका है। एआईएमआईएम चुनिंदा सीटों पर ही लड़ी, लेकिन बीजेपी-विरोधी दलों की धड़कनें बढ़ा गई। कम से कम 7 सीटें ऐसी रहीं, जहां एआईएमआईएम को मिले वोट बीजेपी की जीत के मार्जिन से ज्यादा थे। एआईएमआईएम के जनाधार में इस राष्ट्रव्यापी विस्तार के पीछे खुद ओवैसी हैं, जो संसद में भी चर्चा में रहते हैं और देश भर में मुसलमानों के सबसे भरोसेमंद सियासी रहनुमा बनकर उभरे हैं। पूरे भारत की बात करें तो कांग्रेस के बाद मुसलमानों का वोट एकमुश्त सबसे ज्यादा जा रहा है, तो ओवैसी के चेहरे पर ही जा रहा है।