खतरे में अरावली:अवैध कब्जे, खनन और शहरीकरण से कमजोर पड़ता उत्तर भारत का जीवन कवच; कितना भयावह होगा प्रभाव? - Aravalli Is In Danger Encroachments Illegal Mining Aravallis Severely Impacted Air Quality Climate Regulation

खतरे में अरावली:अवैध कब्जे, खनन और शहरीकरण से कमजोर पड़ता उत्तर भारत का जीवन कवच; कितना भयावह होगा प्रभाव? - Aravalli Is In Danger Encroachments Illegal Mining  Aravallis Severely Impacted Air Quality Climate Regulation

अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों में से एक है। हालांकि यह भी कहना गलत नहीं होगा कि यह सिर्फ पहाड़ नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक जीवन रक्षक कवच की तरह काम करती है। दिल्ली-एनसीआर और गंगा के मैदानी इलाकों को रेगिस्तान, प्रदूषण और जल संकट से बचाने में इसकी भूमिका बेहद अहम है। लेकिन अब यह कवच धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। हाल ही में संकला फाउंडेशन की एक स्टडी 'अरावली लैंडस्केप का इको-रेस्टोरेशन' में इस बात का बड़े पैमाने पर दावा भी किया जा रहा है। 

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रिपोर्ट के अनुसार अरावली क्षेत्र में अवैध कब्जे, जंगलों की कटाई, गैरकानूनी खनन और तेजी से फैलता शहरी निर्माण इस पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा रहा है। इसका सीधा असर भूजल रिचार्ज, जैव विविधता, हवा की गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर पड़ रहा है। विज्ञापन विज्ञापन

कैसा पड़ रहा प्रभाव, जानिए
रिपोर्ट में बताया गया है कि 1980 के दशक से पहले सरिस्का और बरडोद वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल की जमीन को दूसरी जगहों के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे प्राकृतिक जंगल काफी हद तक खत्म हो गए। जंगलों के छोटे-छोटे टुकड़े हो गए, जिससे जानवरों के रहने की जगह और पानी जमा होने वाले इलाके टूट गए।


बता दें कि यह अध्ययन संकला फाउंडेशन ने किया है, जिसमें भारत में डेनमार्क के दूतावास और हरियाणा वन विभाग का सहयोग रहा। इस स्टडी में पर्यावरण संरक्षण को सिर्फ जंगल बचाने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे जैव विविधता, जलवायु बदलाव से निपटने, लोगों की आजीविका और मानव अधिकारों से भी जोड़ा गया है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने जारी किया रिपोर्ट
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि अरावली चार राज्यों और 29 जिलों में फैली हुई है। यहां पांच करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। लेकिन जंगलों की कटाई, गलत जमीन इस्तेमाल और तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण यह नाजुक क्षेत्र तेजी से बंजर होता जा रहा है।

अवैध कब्जों और खनन से कम हो रही हरियाली
रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध कब्जों और खनन की वजह से अरावली की हरियाली कम हो रही है। इससे इसकी ‘ग्रीन बैरियर’ की ताकत कमजोर पड़ गई है। नतीजतन रेगिस्तान फैलने की रफ्तार बढ़ रही है और उत्तर भारत का पर्यावरण संतुलन खतरे में पड़ रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए संकला फाउंडेशन ने गुरुग्राम के अरावली क्षेत्र के चार गांवों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह मॉडल स्थानीय हालात के अनुसार बनाया गया है और इसमें वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ गांव के लोगों की भागीदारी को भी अहम माना गया है।

खत्म हो रहे वन्यजीव और देसी पेड़-पौड़े
स्टडी में पाया गया कि इन गांवों के आसपास के जंगल बहुत खराब हालत में हैं। जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं और वहां विलायती कीकर, लैंटाना और गाजर घास जैसे विदेशी पौधों का कब्जा हो गया है। इन पौधों की वजह से देसी पेड़-पौधे और वन्यजीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सभी गांव खेती के लिए पूरी तरह भूजल पर निर्भर हैं।

इससे जमीन के अंदर पानी तेजी से कम हो रहा है और जंगलों पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। 43 प्रतिशत से ज्यादा परिवार लकड़ी, चारा और औषधीय पौधों के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इन संसाधनों को इकट्ठा करने में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम है, लेकिन उनके पास रोजगार के दूसरे विकल्प बहुत सीमित हैं।

जंगलों को फिर से जीवित करना आवश्यक
इतना ही नहीं स्टडी यह भी बताती है कि यह इलाका अर्ध-शुष्क है। यहां तापमान बढ़ रहा है और बारिश अनियमित हो गई है। ऐसे में जंगलों को फिर से जीवित करना बहुत जरूरी भी है और चुनौतीपूर्ण भी। इसके लिए पेड़ लगाना और पानी को जमीन में रोकने जैसे उपाय जरूरी बताए गए हैं।

गौरतलब है कि रिपोर्ट में एक ऐसा इको-रेस्टोरेशन मॉडल भी सुझाया गया है, जिसमें पहले जमीन और जंगल की पूरी जांच की जाएगी। इसके बाद जरूरत के मुताबिक बहाली के कदम उठाए जाएंगे। अंत में लंबे समय तक निगरानी और सरकारी नीतियों से इसे जोड़ा जाएगा। यह मॉडल अरावली के दूसरे शहरी इलाकों में भी लागू किया जा सकता है।

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