कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति कैसे हुई? आखिर उन्हें यह काम क्यों सौंपा गया? - bhagwan chitragupta ki utpatti aur karmo ka lekha jokha
पुराणों और धर्मशास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा जब यमलोक पहुँचती है, तो चित्रगुप्त उसके कर्मों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं, जिससे तय होता है कि आत्मा स्वर्ग जाएगी या नरक। चित्रगुप्त एक लेखाकार की तरह हैं, जो जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। वे यमराज के साथ यमलोक में रहते हैं और आत्माओं का कर्मों के आधार पर न्याय करते हैं। हिन्दू धर्म में आत्माओं के कर्मों पर विशेष ध्यान दिया गया है। जीवों के अच्छे कर्म न केवल उनके जन्म की योनि तय करते हैं, बल्कि उनकी मुक्ति का भी मार्ग बनते हैं। लेकिन कर्म अच्छा है या बुरा, ये न तो कोई आत्मा तय कर सकती है और ना ही इसके नैतिकता का कोई आधार है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इसकी दूरदर्शिता केवल भगवान् चित्रगुप्त के पास है और वही तय करते हैं कि आपके कर्म अच्छी श्रेणी में गए हैं या बुरी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चित्रगुप्त की उत्पत्ति कैसे हुई और उन्हें यह कार्य कैसे मिला? चलिए जानते हैं...
चित्रगुप्त की उत्पत्ति कैसे हुई?
चित्रगुप्त की उत्पत्ति से जुड़ी कथा मुख्य रूप से गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है। चित्रगुप्त की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा की काया से हुई मानी जाती है। पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि में पाप, अधर्म और अन्याय बढ़ने लगा और मनुष्य अपने कर्मों का दुरुपयोग करने लगा, तब ब्रह्मा जी चिंतित हुए कि कर्मों का सही लेखा-जोखा कैसे रखा जाए। इसी चिंता के समय ब्रह्मा जी ने ध्यान किया। जब ब्रह्मा ने सहस्रों वर्षों तक गहन ध्यान और समाधि की, तब उनके शरीर की काया की छाया से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। वे अत्यंत तेजस्वी, ज्ञानवान और कलम-दवात धारण किए हुए थे। ब्रह्मा ने उन्हें नाम दिया चित्रगुप्त यानि चित्र (आकृति) से उत्पन्न और गुप्त रूप से प्रकट। ब्रह्मा ने चित्रगुप्त को आदेश दिया कि वे हर जीव के कर्मों का लेखा-जोखा रखें। चित्रगुप्त को धर्माधिकारि और पहले दिव्य लेखाकार माना जाता है। उनके पास अग्रसंधानी नामक दिव्य रजिस्टर है, जिसमें हर जीव के कर्म दर्ज होते हैं। मृत्यु के बाद आत्मा जब यमलोक पहुँचती है, तो चित्रगुप्त उसके कर्मों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसी आधार पर यमराज निर्णय लेते हैं कि आत्मा स्वर्ग जाएगी या नरक।
चित्रगुप्त की पूजा क्यों की जाती है?चित्रगुप्त पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि चित्रगुप्त देवता कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले न्यायाधीश माने जाते हैं। उनकी पूजा से व्यक्ति को धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। कायस्थ समाज चित्रगुप्त को अपना कुलदेवता मानता है। कायस्थ परंपरा के अनुसार, चित्रगुप्त के 12 पुत्र हुए, जिनसे कायस्थ समाज के 12 वंश चले। इसी कारण लेखन, प्रशासन और न्याय कायस्थों के प्रमुख गुण माने जाते हैं। दीपावली के बाद यम द्वितीया (भाई दूज) के दिन विशेष रूप से चित्रगुप्त पूजा की जाती है। कलम-दवात उनकी पूजा का मुख्य प्रतीक है क्योंकि वे ज्ञान और न्याय के देवता हैं। चित्रगुप्त का अर्थ यह भी है कि जो गुप्त रूप से जीवों के हर कर्म का पूरा चित्रण करे। इसलिए चित्रगुप्त केवल कर्म नहीं, बल्कि विचार, भावना और वाणी तक का लेखा रखते हैं। चित्रगुप्त पूजा में लोग अपने अज्ञानवश किए गए पापों के लिए क्षमा मांगते हैं।