Board of Peace: क्या है बोर्ड ऑफ पीस? कौन-कौन से देश हुए इसमें शामिल, जानें संयुक्त राष्ट्र से कितना मजबूत होगा यह संगठन
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Board of Peace: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप भले ही ये दावा कर रहे हो कि बोर्ड ऑफ पीस, यूनाइटेड नेशंस की जगह लेगा, लेकिन अभी कुछ पहलू ऐसे हैं जहां पर यूनाइटेड नेशंस का पलड़ा भारी नजर आता है. वहीं, बोर्ड ऑफ पीस की सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक महादेशों को टेबल एक साथ लाने, वीटो पावर का अल्टरनेटिव और वर्ल्ड लेवल इसकी लीगल सैंक्टिटी को लेकर रहेगी.
Published: January 25, 2026 5:52 PM IST
By Satyam Kumar
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बोर्ड ऑफ पीस इन चुनौतियां को दूर करके यूनाइटेड नेशंस की जगह लेगा?
अमेरिकी प्रेसिडेंट ने बोर्ड ऑफ पीस बनाने की घोषणा की है. अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनॉल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि बोर्ड ऑफ पीस यूनाइटेड नेशंस की जगह लेगी. यह बोर्ड इंटरनेशनल मामलों को सुलझाने के लिए तेज और कारगर प्लेटफॉर्म होने का दावा कर रहे हैं. वहीं, यूनाइटेड नेशंस द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर उसकी सुरक्षा परिषद (UNSC) बेहद प्रभावी नहीं नजर आई है. इसी स्थिति को आधार बनाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप बोर्ड ऑफ पीस बनाने की योजना बना रहे हैं.
UN से कैसे अलग बोर्ड ऑफ पीस?
संयुक्त राष्ट्र संघ जहां आम सहमति (Consensus) पर चलता है, वहीं बोर्ड ऑफ पीस एक सेन्ट्रलाइज्ड मॉडल पर आधारित है. UN प्रेसिडेंट का समय-समय पर चुनाव होता है. वहीं, बोर्ड ऑफ पीस के डोनाल्ड ट्रंप को इसका आजीवन अध्यक्ष रहेंगे. बता दें कि यूएन में किसी मसले पर सर्वसम्मति से फैसला लिया जाता है. वहीं, बोर्ड ऑफ पीस के अध्यक्ष के पास किसी भी वैश्विक विवाद पर अकेले फैसला लेने की शक्ति होगी. इसका मतलब है कि इसमें वीटो की रुकावट या लंबी बहसों के लिए कोई जगह नहीं हो. इसी पावर के आधार पर डोनॉल्ड ट्रंप यूएन को बदलने की सोच रहे हैं.
बोर्ड ऑफ पीस अब तक कितने देश हुए शामिल?
बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए 50 देशों को निमंत्रण भेजा गया है. निमंत्रण भारत को भी आया है, लेकिन भारत ने अधिकारिक रुप से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. वहीं, फ्रांस, डेनमार्क और स्वीडन ने इसमें शामिल होने से मना किया है. इसके अलावे दुनिया के 8 मुस्लिम देश इसमें शामिल होने के लिए अपनी रजामंदी दे दी है. इसमें से पाकिस्तान, मिस्त्र और संयुक्त अरब अमीरात सबसे पहले शामिल हुए. वहीं, सऊदी अरब, तुर्की, जॉर्डन, इंडोनेशिया और कतर आदि भी इसमें शामिल होने के पक्ष में हैं. बोर्ड ऑफ पीस में अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत, चीन और रूस जैसे महाशक्ति को अपने पाले में लाने की होगी. क्योंकि ये सभी देश पहले यूएन के सदस्य है और इनकी साख उसमें समय के साथ बेहद मजबूत हुई.
बोर्ड ऑफ पीस के लिए कहां से आएगा पैसा?
यूनाइटेड नेशन (UN) की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी उसकी फंडिंग है. बोर्ड ऑफ पीस को चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा. इसे लेकर अभी कई सारे बातें खुलकर नहीं आई हैं.
बोर्ड ऑफ पीस की लीगल सैंक्टिटी?
सबसे बड़ी बात है कि बोर्ड ऑफ पीस को मान्यता मिलने की बात. जैसे यूनाइटेड नेशंस द्वारा लगाए गए प्रतिबंध और UN के चैप्टर 7 के अनुसार, सेना भेजने की कानूनी शक्ति है. इसके अलावे यह देखना भी बेहद जरूरी होगी कि बोर्ड ऑफ पीस द्वारा लिए गए निर्णय सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होंगे या वे केवल सलाहकारी (Advisory) होंगे.
बोर्ड ऑफ पीस में किसे मिलेगा वीटो पावर
भले ही अमेरिका के साथ इस बोर्ड का हिस्सा बनेंगे लेकिन देखना यह दिलचस्प रहेगा कि इस बोर्ड में शामिल कितने देशों के पास वीटो पावर होंगे क्योंकि UN में अमेरिका, रूस और चीन सहित 5 देशों के पास वीटो पावर है. ऐसे में बोर्ड ऑफ पीस में वीटो पावर कितने देशों के पास होगा या नहीं, या वीटो पावर की जगह आपत्ति जताने की कोई दूसरी प्रणाली तय की जाएगी, देखना दिलचस्प होगा.
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Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
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