Donald Trump India Us Relation Modi,डोनाल्ड ट्रंप के जाने से भी नहीं सुधरेंगे संबंध, दो वजहों से भारत के पीछे पड़ा है अमेरिका, क्यों नहीं पालनी चाहिए गलतफहमी? - why india-us strategic relations will not improve even after donald trump leaves presidency - America News

Donald Trump India Us Relation Modi,डोनाल्ड ट्रंप के जाने से भी नहीं सुधरेंगे संबंध, दो वजहों से भारत के पीछे पड़ा है अमेरिका, क्यों नहीं पालनी चाहिए गलतफहमी? - why india-us strategic relations will not improve even after donald trump leaves presidency - America News
वॉशिंगटन:

भारत में कुछ लोगों का मानना है कि तीन साल के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद से हटेंगे तो अमेरिका का अगला राष्ट्रपति, भारत से संबंध सुधार लेगा। दरअसल, ये एक ऐसी गलतफहमी है, जिससे भारतीयों को जल्द से जल्द निकल जाना चाहिए। ट्रंप 2.0 के दौरान अमेरिका ने जान बूझकर भारत को निशाना बनाया है, 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया है, आतंकवादियों के समर्थक पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर को गले लगाया है और दक्षिण एशिया में भारत का कई बार 'अपमान' करते हुए पाकिस्तान को तरजीह दी गई है। कुछ लोगों का मानना हो सकता है कि ट्रंप ऐसा मोलभाव करने के लिए कर रहे हैं, कुछ लोग इसे ट्रंप का घमंड तो कुछ लोग नोबेल पुरस्कार की चाहत को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, लेकिन यकीन मानिए डोनाल्ड ट्रंप को 'बेवकूफ' समझना हमारी सबसे बड़ी नादानी होगी।

हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि दो देशों के संबंध में नेताओं का व्यक्तित्व अहम भूमिका निभाता है और ट्रंप ने इसे साबित भी किया है। ट्रंप, देशों की संप्रभुता में यकीन नहीं रखते, वो अपने राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपना रहे हैं। अपने घरेलू एजेंडे के लिए उन्होंने क्रूर नीतियां अपनाई हैं, जैसे अवैध प्रवासियों को हथकड़ी में जकड़कर भारत भेजना, फेडरल रिजर्व के चेयरमैन और मिनेसोटा के गवर्नर के खिलाफ आपराधिक जांच का मामला शुरू करना। राष्ट्रपति ट्रंप शक्तियों के बंटवारे और नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांतों का सम्मान नहीं करते, जो अमेरिकी संविधान के मुख्य सिद्धांत हैं।
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अमेरिका की असलियत का चेहरा हैं डोनाल्ड ट्रंप?
कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडो-पैसिफिक स्टडीज के फाउंडर चिंतामनि महापात्रा ने द संडे गार्जियन में एक लेख लिखा है। इसमें उन्होंने लिखा है डोनाल्ड ट्रंप की शाही महत्वाकांक्षा बेशक सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की सबसे अहम कुर्सी पर बैठकर, ट्रंप दूसरे देशों को अमेरिका का 'गुलाम' मानते हैं। उन्होंने अफ्रीका को हाशिये पर धकेल दिया है, उन्हें आज के यूरोप से नफरत है और उनका मकसद 19वीं सदी की शुरुआत के मोनरो सिद्धांत को फिर से जिंदा करके लैटिन अमेरिका पर पूरी तरह से हावी होना है। वह भारत-प्रशांत देशों के साथ अपनी शर्तों पर व्यापार और बिज़नेस करना चाहते हैं। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप वही सब कर रहे हैं, जो असल में अमेरिका पिचले 2-3 सौ सालों से करता आया है, बस अंतर ये है कि ट्रंप इसे खुलेआम कर रहे हैं। बाकी के राष्ट्रपति इसे बैकग्राउंड में करते थे। असल में डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका की उस मानसिकता के प्रतीक हैं, जिसे चकाचौंध, फ्री स्पीच, मानवाधिकार और स्वतंत्रता जैसे भारी भारी शब्दों से छिपाकर रखा जाता है।डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले एक साल में यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमीर जेलेंस्की का वाइट हाउस में अपमान किया, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा का अपमान किया है, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का मजाक उड़ाया है, खुद को वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया है, अपने विदेश मंत्री मार्को रुबियो को क्यूबा का राष्ट्रपति बताया है, ग्रीनलैंड पर मालिकाना हक की मांग की है, वो साफ दिखाता है कि अमेरिका की कैसे ग्लोबल सम्राट बनने की इच्छा है। अमेरिका खुद को दुनिया का चौधरी बता रहा है, क्योंकि उसे समझ में आने लगा है कि कई शक्तियों का उदय हो गया है, जो उसके अहंकार को चुनौती देते हैं। ट्रंप ऐसा अपने शासनकाल के अंत तक कर सकते हैं, लेकिन अमेरिका ऐसा अब ज्यादा वक्त तक नहीं कर सकता है। अमेरिका को समझना चाहिए कि वो अब दुनिया का दादा नहीं रहा।

लेकिन भारत को ये सौचने की जरूरत है आखिर डोनाल्ड ट्रंप पिछले 20-25 सालों से बड़ी मेहनत से बनाए गये भारत-अमेरिका रिश्ते को क्यों खराब कर रहे हैं? चिंतामनि महापात्रा ने इसके पीछे कुछ बड़ी वजहें बताई हैं।
Trump tariffs.
उन्होंने लिखा है कि पहली वजह डोनाल्ड ट्रंप दूसरे देशों की ऐसी हस्तियों को अपने ग्लोबल वर्चस्व के लिए खतरा समझते हैं, जो अपने अपने क्षेत्रों में ताकतवर हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे नेताओं के रहते वो अपने अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे, इसीलिए ऐसे नेता उनके लिए खतरा हैं। लेकिन चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन को वो कंट्रोल नहीं कर सकते। इन दोनों नेताओं ने बार बार ट्रंप को ठेंगा दिखाया है। जबकि भारत कई मामलों में अमेरिका पर काफी निर्भर है, इसलिए वो अकड़ नहीं दिखा सकता। लेकिन मोदी, ट्रंप से ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं, इसीलिए वो भारत को कमजोर बताने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को 'डेड इकोनॉमी' बता रहे हैं। भारत का बार बार अपमान कर रहे हैं। भारतीय अवैध प्रवासियों को हथकड़ी में बांधकर भेज रहे हैं। h1b वीजा को लेकर भारत को परेशान कर रहे हैं। ऐसा वो चीन या अमेरिका के साथ नहीं कर सकते।

वहीं, दूसरा सबक जो भारत को सीखने की जरूरत है वो ये कि डोनाल्ड ट्रंप के बाद भी जो अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा, वो ट्रंप की नीतियों को ही आगे बढ़ाएगा। उसी हद तक या उससे ज्यादा, कम नहीं। इसका सीधा कारण ये है कि कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति एक ऐसे भारत को नहीं देखना चाहेगा, जो ताकतवर हो और जिसके पास रणनीतिक बढ़त हो। इसीलिए भारत को उसी के मुताबिक अपनी नीतियों का निर्धारण करनी चाहिए, जो उसके हित के लिए बेहतर हो और जो अमेरिका पर निर्भरता को काफी कम कर सके।

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