Economy:टैरिफ के खतरों के बीच शक्तिकांत दास ने आत्मनिर्भरता को बताया आर्थिक कवच, जानिए इसके मायने क्या - Shaktikanta Das News Says India's Policies Have Put Wind In Its Sails Economy News
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वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद और टैरिफ के मंडराते खतरों के बीच, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव शक्तिकांत दास ने शुक्रवार को कहा कि भारत अब एक ऐतिहासिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। पहले बिबेक देबरॉय मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए, दास ने जोर देकर कहा कि सरकार की ओर से अपनाई गई नीतियों और सुधारों के कारण भारत 'इनक्रेडिबल इंडिया' (अतुल्य भारत) से 'क्रेडिबल इंडिया' (विश्वसनीय भारत) बनने की यात्रा पर अग्रसर है।
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आत्मनिर्भरता का देश के लिए क्या मतलब?
शक्तिकांत दास ने स्पष्ट किया कि पिछले दशकों में वैश्वीकरण को चलाने वाली आम सहमति अब कमजोर पड़ चुकी है और बहुपक्षीय सहयोग कठिन हो गया है। ऐसे परिदृश्य में, भारत ने 'आत्मनिर्भरता' को अपनी नीतियों के मूल सिद्धांत के रूप में अपनाया है। उन्होंने 'आत्मनिर्भरता' की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए दो बातों पर जोर दिया।
विज्ञापन विज्ञापन रणनीतिक लचीलापन: यह दुनिया से कटने की नीति नहीं है, बल्कि मुख्य क्षमता और लचीलेपन को बनाने की रणनीति है। घरेलू क्षमता: आर्थिक आत्मनिर्भरता का अर्थ है देश के भीतर महत्वपूर्ण वस्तुओं और तकनीकों के उत्पादन की क्षमता विकसित करना और विदेशी स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना। पूर्व आरबीआई गवर्नर ने कहा कि मजबूत घरेलू क्षमताओं वाली आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था विकास को बनाए रखने की शक्ति देती है, जबकि एक स्वायत्त विदेश नीति बाहरी चुनौतियों से निपटने में राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करती है।
वैश्विक चुनौतियों पर क्या बोले शक्तिकांत दास?
दास का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक हवाएं बदल रही हैं। विशेष रूप से, अमेरिका 'रूसी तेल पर प्रतिबंध विधेयक' पर विचार कर रहा है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों- जिनमें भारत और चीन शामिल हैं- पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान हो सकता है। दास ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर चिंता जताते हुए ये बातें कही-
बहुपक्षवाद पर दबाव: पारंपरिक बहुपक्षवाद, जो कभी वैश्विक शासन का आधार था, अब भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और संरक्षणवाद के कारण हाशिए पर है। संस्थानों का कमजोर होना: नियम-आधारित प्रणालियों की नींव माने जाने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थान अपने मूल जनादेश को पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं। व्यापार को हथियार बनाया जा रहा: व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं को अब व्यवधान और प्रभुत्व के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। 'री-शोरिंग' (घरेलू उत्पादन) और 'फ्रेंड-शोरिंग' (मित्र देशों के साथ व्यापार) जैसी प्रवृत्तियां वैश्विक नेटवर्क को खंडित कर रही हैं।
क्या भारत के लिए संकट का दौर खत्म हो गया?
तमाम चुनौतियों के बावजूद, दास ने विश्वास जताया कि भारत 2020 के कोविड-19 संकट के बाद से आए कई वैश्विक झटकों के 'परफेक्ट स्टॉर्म' (पूर्ण तूफान) से सफलतापूर्वक बाहर निकल आया है। उन्होंने कहा, "अब देश द्वारा अपनाई गई नीतियों के साथ, हवा हमारे पक्ष में है। हम वास्तव में 'विकसित भारत' की राह पर हैं"। दास ने स्वीकार किया कि ज्ञात और अज्ञात स्रोतों से चुनौतियां आती रहेंगी, लेकिन भारत का रुख स्पष्ट है। भारत एक सहकारी और नियम-आधारित वैश्विक प्रणाली का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही ऐसी दुनिया में अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने के लिए सक्रिय रूप से साझेदारी भी बना रहा है जहां शक्ति का केंद्र अब बिखर चुका है।
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