Explainer: क्या है रोमियो जूलियट कानून, क्यों और किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया इसका जिक्र, किन देशों में है लागू?

Explainer: क्या है रोमियो जूलियट कानून, क्यों और किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया इसका जिक्र, किन देशों में है लागू?

एक्सप्लेनर Explainer: क्या है रोमियो जूलियट कानून, क्यों और किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया इसका जिक्र, किन देशों में है लागू?

Explainer: सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण कानून यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है. कोर्ट ने माना कि एक सख्त कानून होने के बावजूद इसका बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है.

Written byDheeraj Sharma

Explainer: सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण कानून यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है. कोर्ट ने माना कि एक सख्त कानून होने के बावजूद इसका बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है.

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Dheeraj Sharma 10 Jan 2026 14:36 IST

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Explainer: रोमियो-जूलियट कानून' एक कानूनी प्रावधान है जिसका उद्देश्य आपसी सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों को बलात्कार या POCSO (पॉक्सो) जैसे कठोर कानूनों की आपराधिक श्रेणी से बाहर रखना है. 10 जनवरी 2026 यानी शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को POCSO एक्ट में इस तरह का 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' जोड़ने का सुझाव दिया है. 

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सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण कानून यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है. कोर्ट ने माना कि एक सख्त कानून होने के बावजूद इसका बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है, खासकर उन मामलों में जहां नासमझी या भावनात्मक उम्र में किशोर आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं. ऐसे मामलों में पॉक्सो की कठोर धाराएं युवाओं का भविष्य बर्बाद कर देती हैं. 

केंद्र सरकार को ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ पर विचार का सुझाव

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस समस्या से निपटने के लिए कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने पर गंभीरता से विचार करे. कोर्ट का मानना है कि इस तरह का प्रावधान लाने से उन किशोरों को राहत मिलेगी, जो अपराधी नहीं बल्कि उम्र और समझ की कमी के चलते रिश्तों में पड़ जाते हैं.

मामला कैसे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा

यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी को जमानत दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का तर्क पूरी तरह सही नहीं था, लेकिन आरोपी को दी गई जमानत को बरकरार रखा। इसी दौरान कोर्ट ने पॉक्सो के दुरुपयोग के व्यापक मुद्दे पर टिप्पणी की.

बार-बार सामने आ रहा है कानून का दुरुपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून के गलत इस्तेमाल को लेकर पहले भी न्यायालयों ने संज्ञान लिया है. कई मामलों में यह देखा गया है कि परिवारों की असहमति या सामाजिक दबाव के चलते सहमति से बने किशोर रिश्तों को यौन अपराध का रूप दे दिया जाता है. इससे न केवल आरोपी किशोर को जेल जाना पड़ता है, बल्कि उसका सामाजिक और मानसिक जीवन भी प्रभावित होता है.

केंद्र को ठोस कदम उठाने की सलाह

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकार ऐसे उपायों पर विचार करे, जिनसे...

- वास्तविक किशोर संबंधों को पॉक्सो की कठोर धाराओं से अलग किया जा सके

- कानून के दुरुपयोग के मामलों की पहचान हो सके

- बदले या दबाव में केस दर्ज कराने वालों पर भी कार्रवाई की व्यवस्था बने

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क्या है ‘रोमियो-जूलियट कानून’?

‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ एक ऐसा कानूनी प्रावधान होता है, जो करीबी उम्र के किशोरों के बीच सहमति से बने रिश्तों को आपराधिक दायरे से बाहर रखने में मदद करता है. कई देशों में इस तरह के कानून पहले से मौजूद हैं. भारत में समस्या यह है कि पॉक्सो एक्ट में सहमति का कोई महत्व नहीं है. यदि लड़की 18 वर्ष से कम उम्र की है, तो रिश्ता चाहे आपसी सहमति से ही क्यों न हो, उसे अपराध माना जाता है.

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, न कि नासमझ किशोरों को अपराधी बनाना। ऐसे प्रावधान जरूरी हैं, जो यह तय कर सकें कि...

- कौन सा मामला वास्तविक यौन अपराध है

- कौन सा मामला आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों का है

इन देशों में भी है रोमियो-जूलियट जैसा कानून लागू

अमेरिका (United States)

अमेरिका में अधिकांश राज्यों में रोमियो-जूलियट कानून लागू है, हालांकि नियम राज्य-दर-राज्य अलग हैं.
आम तौर पर 2 से 4 साल तक की उम्र के अंतर को स्वीकार किया जाता है.  यदि दोनों पक्ष नाबालिग हों या एक नाबालिग और दूसरा थोड़ा बड़ा हो, तो सहमति को अपराध नहीं माना जाता.  इसका उद्देश्य सहमति वाले किशोर संबंधों को बलात्कार जैसे अपराधों से अलग रखना है. 

कनाडा

कनाडा में इसे Close-in-Age Exemption कहा जाता है.  इसमें 14–15 साल के किशोर अपने से 5 साल तक बड़े व्यक्ति के साथ सहमति से संबंध बना सकते हैं.  12–13 साल के लिए यह अंतर 2 साल तक सीमित है.  शोषण, दबाव या शक्ति असंतुलन होने पर यह छूट लागू नहीं होती. 

यूनाइटेड किंगडम (UK)

ब्रिटेन में सहमति की उम्र 16 साल है, लेकिन किशोरों के बीच सहमति वाले रिश्तों में आपराधिक कार्रवाई से बचने का व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है.  अभियोजन एजेंसियां ऐसे मामलों में विवेकाधिकार का इस्तेमाल करती हैं.  उद्देश्य सजा देने के बजाय संरक्षण और परामर्श होता है. 

जर्मनी

जर्मनी में सहमति की उम्र 14 साल है. 14–15 वर्ष के किशोरों के मामलों में यदि शोषण या दबाव नहीं है, तो संबंध अपराध नहीं माना जाता.  कानून विशेष रूप से यह देखता है कि कोई शक्ति या उम्र का अनुचित फायदा तो नहीं उठाया गया. 

फ्रांस

फ्रांस में सहमति की उम्र 15 साल है. करीबी उम्र के किशोरों के बीच सहमति वाले संबंधों को सामान्यतः अपराध नहीं माना जाता. यदि स्पष्ट सहमति हो और शोषण न हो, तो कठोर सजा से बचा जाता है

ऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया के कई राज्यों में रोमियो-जूलियट जैसे प्रावधान मौजूद हैं. सामान्यतः 2 साल तक की उम्र का अंतर स्वीकार्य है.  कानून का जोर शोषण रोकने पर है, न कि किशोर प्रेम संबंधों को अपराध बनाने पर. 

जापान

जापान में राष्ट्रीय स्तर पर सहमति की उम्र कम है, लेकिन प्रांतीय कानूनों में करीबी उम्र के किशोरों को छूट दी जाती है. शोषण और दबाव के मामलों में सख्त कार्रवाई होती है.

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पॉक्सो कानून की समीक्षा की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है. यदि केंद्र सरकार ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ को लागू करती है, तो इससे कानून और न्याय के बीच बेहतर संतुलन बन सकता है और निर्दोष किशोरों का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा.

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