Freedom at Midnight Season 2 Web Series Review In Hindi Rating {3.5/5} |फ्रीडम एड मिडनाइट सीजन 4 रिव्यू, रेटिंग {3.5/5}: भारतीय इतिहास का मजबूत दस्तावेज, जानदार परफॉर्मेंस से सजी है सीरीज
मूवी रिव्यू
वेब सीरीज रिव्यू: फ्रीडम एट मिडनाइट 2Authored by: उपमा सिंह•Edited by: संगीता तोमर|नवभारत टाइम्स•10 Jan 2026, 12:08 pmऐक्टर:सिद्धांत गुप्ता,राजेंद्र चावला,चिराग वोहरा,आरिफ जकारिया,इरा दुबे,आरजे मलिष्का,ल्यूक मैकगिब्नी,कॉर्डेलिया बुगेजाश्रेणी:Hindi, पीरियड ड्रामाडायरेक्टर :निखिल आडवाणीअवधि:0 Hrs 45 Minरिव्यू लिखें
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0.5 1 1.5 2 2.5 3 3.5 4 4.5 52.5/5Submitलेखक विलियम एल शीरर की किताब ‘राइज ऐंड फॉल ऑफ थर्ड राईच’ की शुरुआती लाइन है, ‘दोज हू फॉरगेट हिस्ट्री आर कंडेम्ड टू रिपीट इट’ यानी जो अपना इतिहास भूल जाते हैं, वे उसे दोबारा दोहराते हैं। इसलिए, फिल्मकार निखिल आडवाणी अपनी सीरीज 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के जरिए 1947 के उस ऐतिहासिक लेकिन विवादित पन्ने को पलटते हैं, जब देश को आजादी की कीमत बंटवारे के अब तक रिसने वाले जख्मों से चुकानी पड़ी थी। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर की इसी नाम से लिखी चर्चित किताब पर आधारित इस सीरीज का दूसरा सीजन आ चुका है, जिसमें निखिल हिंदुस्तान और पाकिस्तान के स्वतंत्र अस्तित्व में आने के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद के राजनीतिक-सामाजिक हालातों, चुनौतियों को बहुत ही गहराई और संवेदनशील ढंग से पर्दे पर उतारा है।
‘फ्रीडम एट मिडनाइट 2’ की कहानी
‘फ्रीडम एट मिडनाइट 2’ की शुरुआत 1947 के उस ऐतिहासिक दौर में ले जाती है, जब देश आजादी से कुछ कदम ही दूर है। जब पंडित नेहरू, सरदार पटेल जैसे नेता आजाद भारत के स्वरूप और भविष्य की नींव रख रहे होते हैं। एक सीन है, जब भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंगों पर चर्चा होती है कि ये रंग साहस, शांति और समृद्धि का प्रतीक होंगे, वहीं चक्र समय परिवर्तन का, तब मौलाना अबुल कलाम आजाद कहते हैं- मुझे तो लगा, केसरिया हिंदू और हरा मुस्लिम का प्रतीक हैं'।
इस पर पंडित नेहरू कहते है- 'इस नए हिंदुस्तान में कुछ भी मजहब के आधार पर नहीं होगा। एक आजाद, सेक्युलर हिंदुस्तान की पहचान सिर्फ इंसानियत होगी।' और सामने बैठे सरदार पटेल की ओर देखते हैं, जिनके खामोश चेहरे पर संशय साफ देखा जा सकता है। जैसे-जैसे बंटवारा करीब आता है, भारत-पाकिस्तान की सरहदें तय करने के लिए खींची गई रेडक्लिफ लाइन के दोनों ओर भयावह पलायन शुरू हो जाता है।' धर्म के नाम पर दिल दहलाने वाली हिंसा, आगजनी, लूटपाट, बलात्कार और हत्याएं शुरू हो जाती हैं, जो आजादी के जश्न को फीका कर देती हैं।
‘फ्रीडम एट मिडनाइट 2’ का ट्रेलर
‘फ्रीडम एट मिडनाइट 2’ वेब सीरीज रिव्यू
निखिल आडवाणी ने सरहद के दोनों ओर अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए लोगों के पलायन का मार्मिक चित्रण किया है। श्वेत-श्याम रंग और अमृता प्रीतम की आज अक्खां वारिस शाह नूं जैसी पंक्तियां उस खौफनाक मंजर के दर्द को और गहरा करती हैं। इसके बाद कहानी रजवाड़ों के विद्रोह, फिर 565 रियासतों के भारत में विलय, कश्मीर की जंग और आखिर में हिंदुस्तान का बंटवारा होने से पहले मेरे शरीर का बंटवारा होगा का दावा करने वाले महात्मा गांधी की हत्या तक जाती है।
सीरीज की बड़ी खूबी ये है कि एक ओर जहां इतिहास के घटनाक्रमों का सशक्त दस्तावेजीकरण है, वहीं दूसरी ओर यह एक संवेदनशील ह्यूमन ड्रामा भी है। फिर वो अपना घर-बार, सालों के दोस्त-यार से बिछड़ने वाले सिखों-मुस्लिमों का दर्द हो या आदर्शवादी नेहरू और प्रैक्टिकल सरदार पटेल के वैचारिक विमर्श या अपने अहिंसा के मूल्यों को अपने ही देश में कमजोर होते देखने वाले महात्मा गांधी का दुख। इसके चलते सीरीज आपको बांधे रखती है, साथ ही सोचने पर भी मजबूर करती है।
सीरीज का एक बड़ा सशक्त पहलू कलाकारों की एक्टिंग है। आदर्शवादी नेहरू के रूप में सिद्धांत गुप्ता ने यादगार अभिनय किया है। उनका तेज, बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलिवरी शानदार है, बस उनका मेकअप और विग कहीं-कहीं खलता है। वहीं, सख्त और व्यावहारिक सरदार पटेल की भूमिका में राजेंद्र चावला ने भी जान डाल दी है।
सेब की पेटियों के दम पर रजवाड़ों की रियासतों को भारत में जोड़े रखने की उनकी कूटनीति देखने लायक है। चिराग वोहरा ने भी महात्मा गांधी के रूप में बढ़िया काम किया है, तो आरिफ जकारिया जिन्ना की रूप में पानी की तरह ढल गए हैं। हालांकि, उनका किरदार हर वक्त चिढ़ा रहने वाला, नकारात्मक यानी एकरंगी है, जो खलता है। इसके अलावा, माउंटबेटन के रूप में ल्यूक मैकगिब्नी और फातिमा जिन्ना के रूप में इरा दुबे भी प्रभावी हैं।
तकनीकी रूप से एडिटिंग, सिनेमटोग्राफी, ओरिजिनल फुटेज का इस्तेमाल भी सीरीज को मजबूत बनाते हैं। हालांकि, अपने विषय वस्तु के चलते सीरीज कहीं-कहीं जटिल लग सकती है, फिर भी, इतिहास के अहम पन्ने पलटती यह सीरीज देखी जानी चाहिए।
क्यों देखें- हिंदुस्तान के इतिहास और राजनीति में रुचि हो तो यह सीरीज देखी जानी चाहिए।
लेखक के बारे मेंउपमा सिंहपत्रकारिता में 17 साल का अनुभव। अमर उजाला लखनऊ और दैनिक भास्कर लुधियाना से अनुभव बटोरते-बांटते नवभारत टाइम्स पहुंचीं। फिलहाल एनबीटी मुंबई में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। सिनेमा प्यार, पैशन और प्रफेशन तीनों है, तो सिनेमा और सिनेमाई हस्तियों से जुड़े विषयों पर गहरी पकड़ रखती हैं। वहीं, जेंडर इक्वॉलिटी और महिला मुद्दों पर भी धारदार कलम चलाती हैं। इसके लिए उन्हें लाडली मीडिया अवॉर्ड फॉर जेंडर सेंसिबिलिटी से भी सम्मानित किया गया है।... और पढ़ेंकन्वर्सेशन शुरू करेंकमेंट पोस्ट करें