ट्रेन में महिला की सीट के सामने पेशाब करने वाले जज पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, HC के फैसले पर लगाई रोक - supreme court slammed judicial officer conduct urination in train compartment stayed on mp high court order
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सिविल जज की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था और उसे फिर से बहाल करने का निर्देश दिया गया था। जूडिशल ऑफिसर पर ट्रेन में हंगामा करने, एक महिला यात्री को अश्लील इशारे करने के साथ ही ट्रेन कंपार्टमेंट में उसकी सीट के सामने पेशाब करने का आरोप था। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि ज्यूडिशियल ऑफिसर का यह व्यवहार 'गंभीर दुर्व्यवहार' था। उसे बर्खास्त कर देना चाहिए था।
ऑफिसर के व्यवहार को बताया 'घिनौना'
जस्टिस विक्रम नाथ और मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को चौंकाने वाला पाया और कहा कि जूडिशल ऑफिसर का व्यवहार 'घिनौना' था। बेंच ने कहा कि आपको बर्खास्त किया जाना चाहिए था। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि नोटिस जारी करें, जिसका जवाब चार सप्ताह के भीतर देना होगा। इस बीच, विवादित फैसले का प्रभाव और क्रियान्वयन स्थगित रहेगा। मामले की सुनवाई छह सप्ताह बाद के लिए स्थगित कर दी गई है। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट की तरफ से अपने रजिस्ट्रार जनरल के जरिए दायर याचिका पर, एक डिवीजन बेंच के आदेश के खिलाफ नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान, प्रतिवादी के वकील (जो कैविएट पर पेश हुए थे) ने कोर्ट को बताया कि मेडिकल जांच रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित समय पर प्रतिवादी नशे में नहीं था।
2018 में ट्रेन में किया था हंगामा
मामले में आरोपी मध्य प्रदेश में एक सिविल जज (क्लास-II) थे। उन्हें 2018 में ट्रेन में हंगामा करने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। उन पर नशे की हालत में सह-यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने और कंडक्टर/TTE (ड्यूटी पर मौजूद सरकारी कर्मचारी) को गाली देने का आरोप था। दावों के अनुसार, उन्होंने एक महिला यात्री के सामने अश्लील हरकतें भी कीं और उसकी सीट के सामने पेशाब कर दिया। उन्होंने सह-यात्रियों को अपना पहचान पत्र भी दिखाया और उन्हें धमकी दी।
जांच अधिकारी की तरफ से सभी आरोप सही पाए जाने के बाद, प्रशासनिक समिति ने न्यायिक अधिकारी को हटाने की सिफारिश की थी। इस सजा को हाई कोर्ट की फुल बेंच ने मंजूरी दे दी। इसके बाद, गवर्नर ने उनके खिलाफ टर्मिनेशन ऑर्डर जारी कर दिया।
हाई कोर्ट का किया था रुख
इसके बाद न्यायिक अधिकारी ने हाई कोर्ट का रुख किया। उनकी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, डिवीजन बेंच ने गवर्नर द्वारा पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, जांच अधिकारी, प्रशासनिक समिति और हाई कोर्ट की फुल बेंच द्वारा दोषी होने के निष्कर्ष एक जैसे थे। हाई कोर्ट ने उन्हें बहाल करने का निर्देश देते हुए, बेंच ने बिना पूर्व अनुमति के यात्रा करने और अपनी गिरफ्तारी के बारे में हाई कोर्ट को सूचना न देने के लिए केवल मामूली सजा देने की छूट दी।