High Court :आरोपी की उपस्थिति से छूट की अर्जी जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं - The Application For Exemption From The Appearance Of The Accused Is Not A Violation Of The Bail Conditions
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई आरोपी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट की अर्जी दाखिल करता है तो उसे कार्यवाही को लटकाने या जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने वाली ‘स्थगन अर्जी’ नहीं माना जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति नलिन कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने वाराणसी के पीयूष वर्मा की अग्रिम जमानत अर्जी रद्द करने की मांग में दायर याचिका खारिज कर दी।
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सत्र न्यायाधीश ने 31 मई 2025 को वाराणसी के भेलूपुर थाने में विश्वासघात और साजिश की शिकायत मामले में आरोपी पूजा ग्रोवर की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली थी। शिकायतकर्ता पीयूष वर्मा ने हाईकोर्ट में आरोपी की जमानत रद्द करने की अर्जी दायर की। उनके के वकील ने दलील दी कि आरोपी मुकदमे में सहयोग नहीं कर रहीं और लगातार स्थगन की अर्जियां देकर कार्यवाही लटका रही हैं, जो जमानत की शर्तों का उल्लंघन है। इस पर पूजा के वकील ने दलील दी कि स्थगन नहीं, व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए आरोपी ने अर्जी दायर की थी। क्योंकि, वह पति के साथ शहर से बाहर थीं। उस तारीख पर सबूत की कार्यवाही नहीं थी। ऐसे में अनुपस्थिति में सबूत दर्ज किए जा सकते हैं, जिसमें आरोपी कोई आपत्ति नहीं करेगी।
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कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि उपस्थिति से छूट मांगने का अर्थ केवल इतना है कि आरोपी विशेष परिस्थितियों के कारण स्वयं उपस्थित नहीं हो पा रहा है, जबकि वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से कार्यवाही में भाग लेने के लिए तैयार है।
फैसले की प्रति सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को भेजी जाए
कोर्ट ने ‘उपस्थिति से छूट’ और ‘कार्यवाही के स्थगन’ के बीच अंतर को समझाया। कहा कि अक्सर न्यायिक अधिकारियों के बीच भी इन दोनों को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए निर्देश दिया कि यदि वकील अदालत में मौजूद है तो आरोपी की भौतिक अनुपस्थिति में भी मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाई जा सकती है। इसे न्याय की प्रक्रिया में बाधा नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को भेजी जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के कानूनी भ्रम से बचा जा सके।