India-germany:जर्मनी की दोस्ती से भारत को मिलेंगे बड़े लाभ, चीन से मुकाबले को मिलेगी ताकत - India Will Receive Significant Benefits Friendship With Germany Strengthening Position Competing China
विस्तार Follow Us
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा के पहले दिन दोनों देशों के लिए अच्छे संकेत मिले हैं। दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर के उत्पादन, क्रिटिकल मिनरल्स में आपसी सहयोग बढ़ाने, डिजिटल व्यवस्था लागू करने, एआई तकनीक अपनाने, सबमरीन के उत्पादन, ऊर्जा और तकनीक में आपसी सहयोग बढ़ाने पर कई समझौते हुए हैं। कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गंभीरता से चर्चा हुई है जिसको आने वाले समय में समझौतों के रूप में बदलते हुए देखा जा सकता है। इसका भारत को लाभ मिल सकता है। वहीं, जर्मनी को भी भारत के रूप में अपने उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार मिल सकता है।
और पढ़ें
Trending Videos
यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं
भारत और जर्मनी के बीच सेवाओं और वस्तुओं का व्यापार वर्ष 2024 में 50 बिलियन डॉलर को पार कर गया था। यह भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच होने वाले कुल व्यापार का एक चौथाई है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। जर्मन चांसलर मर्ज की वर्तमान भारत यात्रा के दौरान इंडिया जर्मन डिजिटल डायलॉग 2026-27 के लिए भी सहमति बनने की उम्मीद है। इसके बाद दोनों देश आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, इंटरनेट और अन्य नवाचारों में एक दूसरे को सहयोग करेंगे। भारत में जिस तरह इंटरनेट की खपत और डिजिटल सेवाओं का फैलाव हो रहा है, उसे देखते हुए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर की इंटरनेट कनेक्टिविटी सुविधा देने में यह सहयोग महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
विज्ञापन विज्ञापन
जर्मन चांसलर मर्ज के साथ जर्मनी की सबमैरीन कंपनी के मुख्य अधिकारी भी भारत आए हैं। इसका सीधा उद्देश्य है कि भारत की रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की इच्छा का जर्मनी लाभ उठाना चाहता है। यदि इस समझौते पर दोनों देशों के बीच आगे बढ़ने पर सहमति बनती है तो इससे भारत को रक्षा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सहयोग मिलेगा। अभी भारत सबमरीन क्षेत्र में रूस के सहयोग से एक बड़ा खिलाड़ी बनने की ओर अग्रसर है। जर्मनी इस गति को तेज कर सकता है। चीन जिस तरह हिंद महासागर में अपनी दखल बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है, सबमैरीन क्षेत्र में भारत के लिए मजबूत होना उसकी बड़ी आवश्यकता है।
इस यात्रा में दोनों देशों के बीच बैटरी उत्पादन की तकनीक पर समझौता भी हो सकता है। भारत में जिस तरह स्मार्ट फोन, लैपटॉप से लेकर ई वाहनों और सौर ऊर्जा का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, भविष्य में सुरक्षित और उन्नत किस्म की बैटरी बनाना बेहद आवश्यक होगा। चीन इस मामले में एक वैश्विक शक्ति बन चुका है, लेकिन आर्थिक-सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस तरह चीन ने रेयर अर्थ मेटल को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है, इतने महत्त्वपूर्ण उत्पाद के लिए उस पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रहा जा सकता। जर्मनी भी इस सेक्टर का एक महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी है। वह भारत को बैटरी सेक्टर का एक बड़ा खिलाड़ी बनने में सहयोग कर सकता है।
ये भी पढ़ें: कौन है अरिहा शाह?: जिसका मुद्दा PM मोदी ने जर्मन चांसलर के सामने उठाया; पूरे मामले पर क्या बोला विदेश मंत्रालय
एफटीए पर सहमति भारत की प्राथमिकता
अमेरिकी टैरिफ के दबाव को खत्म करने के लिए भारत लगातार दूसरे देशों से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) कर रहा है। मध्य पूर्व के देशों और अनेक यूरोपीय देशों से भी वह इस पर बातचीत कर रहा है और अनेक देशों से यह समझौता अंतिम रूप से हासिल किया जा चुका है। भारत जर्मनी के साथ भी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करना चाहता है जिससे भारत के उत्पादों को जर्मनी में बेहतर स्थान और मूल्य मिल सके। भारत की जो कंपनियां जर्मन तकनीक का आयात करना चाहती हैं, उन्हें भी इसका लाभ मिल सकता है।
इंडस्ट्री 4.0 को स्थापित करने में बड़ा सहयोग कर सकता है जर्मनी
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि आज पूरी दुनिया में इंडस्ट्री 4.0 का विचार सबसे तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। इसमें कंपनियों के किसी भी उत्पाद को बेकार नहीं जाने दिया जाता। बल्कि उसे पूरी तरह रिसाइकिल कर नए लाभकारी उत्पाद में कन्वर्ट कर एक तरफ कंपनियों का लाभ बढ़ाया जाता है, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण और कचरे को रोकने में सहायता मिलती है।
भारत इस समय जिस तरह की परिस्थिति से गुजर रहा है, उसके पास हाथ ज्यादा हैं। उसे उसी क्षमता के अनुसार रोजगार सृजन करना होगा। इस संदर्भ में इंडस्ट्री 4.0 का विचार भारत के लिए विशेष लाभकारी साबित हो सकता है क्योंकि इससे उसे आर्थिक लाभ, प्रदूषणकारी तत्वों को कम करने में सहायता मिलेगी। इसके अलावा उसकी एक बड़ी आबादी को रिसाइक्लिंग सेक्टर में नौकरियां मिलेंगी।
डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, जर्मनी तकनीक और मशीनीकरण के मामले में आज भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में शामिल है। उसकी कारों, स्वच्छ ऊर्जा उपायों से लेकर हाइड्रोजन की क्षमताओं के दोहन के मामले में उसका कोई मुकाबला नहीं है। चूंकि भारत इन्हीं क्षेत्रों में बढ़त हासिल करना चाहता है, उसके लिए जर्मनी का सहयोग काफी लाभकारी साबित हो सकता है।
जर्मनी के लिए भारत महत्वपूर्ण क्यों
भारत और जर्मनी लंबे समय से परस्पर दोस्त रहे हैं। जर्मनी को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में भारत शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को भारत-जर्मनी के उच्चाधिकारियों की एक बैठक के दौरान बताया है कि दोनों देश आपसी दोस्ती और राजनयिक संबंध बनाने के 75 वर्ष को मनाएंगे। जर्मनी में इस समय भी तीन लाख भारतीय रहते हैं जिसमें 60 हजार छात्र हैं।
दरअसल, चीन इस समय तकनीक के मामले में दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शामिल हुआ है। उसके उत्पादों के प्रति अब आम लोगों के बीच विश्वसनीयता बढ़ रही है। उसके उत्पादों ने अमेरिकी और यूरोपीय उत्पादों को कीमत और गुणवत्ता दोनों ही सेक्टरों में पछाड़ा है। इससे अमेरिकी-यूरोपीय कंपनियों के सामने एक संकट पैदा हुआ है।
फ्रेडरिक मर्ज के साथ इस दौरे में सीमेंस कंपनी के कुछ अधिकारी भी आए हैं। जर्मनी की एक प्रमुख कंपनी सीमेंस एक समय पर मोबाइल फोन निर्माता कंपनियों में अग्रणी कंपनी मानी जाती थी। लेकिन घटते व्यापार के बीच इस कंपनी को मोबाइल फोन बेचने की अपनी पूरी यूनिट को बेचने पर मजबूर होना पड़ा। (सीमेंस अब ऊर्जा और स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रमुख तौर पर काम करती है।) जबकि इसी दौर में चीन की अनेक कंपनियों ने भारतीय बाजार पर अपना एकछत्र राज स्थापित कर लिया। जर्मनी का चीन को होने वाला व्यापार घटा है। भारत से दोस्ती का लाभ उठाकर जर्मनी भारत में अपना व्यापार बढ़ाकर एक बड़ा बाजार हासिल करना चाहता है। यानी भारत-जर्मनी के बीच दोस्ती दोनों ही देशों के लिए लाभ पहुंचाने वाली है।