India-US Trade Deal Delay: भारत-अमेरिका ट्रेड डील लटकने से टेंशन, न हो पाई तो क्‍या सबकुछ खत्‍म? एक्‍सपर्ट ने कह दी बड़ी बात - india-us trade deal is everything over if it not happens ex rbi mpc member economist ashima goyal opinion on what are alternatives

India-US Trade Deal Delay: भारत-अमेरिका ट्रेड डील लटकने से टेंशन, न हो पाई तो क्‍या सबकुछ खत्‍म? एक्‍सपर्ट ने कह दी बड़ी बात - india-us trade deal is everything over if it not happens ex rbi mpc member economist ashima goyal opinion on what are alternatives
नई दिल्‍ली:

भारत-अमेरिका व्यापार डील में देरी को लेकर टेंशन बढ़ी है। बढ़ती चिंताओं के बीच आरबीआई मौद्रिक नीति समिति (MPC) की पूर्व सदस्य और अर्थशास्त्री आशिमा गोयल ने एक बड़ी बात कह दी है। उन्‍होंने इस विचार को खारिज कर दिया है कि भारत की आर्थिक तरक्की सिर्फ वाशिंगटन पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि आज के समय में उभरते बाजार और दूसरे देशों के साथ साझेदारी कहीं ज्‍यादा मायने रखती है। गोयल ने बताया कि अमेरिका पर इतना ज्‍यादा ध्यान देना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने यह बात आरबीआई की ब्याज दरें तय करने वाली समिति में रहते हुए भी महसूस की थी। जब वह बाजारों से बातचीत करती थीं तो उन्हें अमेरिका पर एक हद से ज्‍यादा जोर दिखाई देता था। शायद इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका से जुड़ी जानकारी बहुत ज्‍यादा आती है। वहां से काफी विदेशी निवेश (एफडीआई) भी आता है।

गोयल ने यह भी कहा कि कैपिटल फ्लो और एक्‍सचेंज रेट्स जैसे संवेदनशील मामलों में भी भारत के पास अक्सर जितनी स्वतंत्रता मानी जाती है, उससे कहीं ज्‍यादा रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विनिमय दर के मामले में क्योंकि भारत में कैपिटल अकाउंट कनवर्टिबिलिटी का एक क्रम है। इसलिए ब्याज दर के प्रति संवेदनशील प्रवाह यानी वे पैसे जो ब्याज दरों में बदलाव के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं, उतने बड़े नहीं हैं। इस वजह से भारत अमेरिका से काफी हद तक स्वतंत्र होकर अपनी ब्याज दरों को तय कर पाता था।

दुन‍िया के व‍िकास में उभरते बाजारों की ह‍िस्‍सेदारी 50% से ज्‍यादा

आशिमा गोयल ने कहा कि आज भी वह अमेरिका के साथ व्यापार डील पर वही ध्यान केंद्रित होते हुए देख रही हैं। लेकिन, उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने वैश्विक विकास के बदलते पैटर्न की ओर इशारा किया। गोयल के अनुसार, आज दुनिया के विकास में उभरते बाजारों का हिस्सा 50% से ज्‍यादा है। अगर अमेरिका सहयोग करने को तैयार नहीं होगा तो लोग अपने विकल्प खुद विकसित कर लेंगे। उन्होंने कहा कि हमें इन विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए। अमेरिका के साथ व्यापार डील को लेकर ज्‍यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि ये विकल्प कितने कारगर हैं।

गोयल ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत की अमेरिका के बाजार पर निर्भरता अन्य प्रमुख एशियाई देशों की तुलना में सीमित है। उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही भारत अमेरिका पर या अमेरिका के साथ व्यापार पर उतना निर्भर नहीं रहा है। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा बहुत छोटा है। खासकर जापान या दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तुलना में। यह एक फायदा है क्योंकि यह इतना बड़ा नहीं है कि कोई बड़ा असर डाल सके। भारत अपने विकल्प विकसित कर रहा है।

बड़ी कीमत चुकाकर डील का फायदा नहीं

इसके साथ ही, पूर्व एमपीसी सदस्य ने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ व्यापक संबंधों को देखते हुए भारत वाशिंगटन के साथ गहरे जुड़ाव के लिए खुला है। उन्होंने कहा कि हम अमेरिका के साथ जुड़ना चाहते हैं। वहां बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग (NRI) रहते हैं। हमें अमेरिका के साथ कई तरह की बातचीत से बहुत फायदा दिखता है। इसलिए हम यह जारी रखेंगे। हम इसके लिए तैयार हैं और डील को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहेंगे।

अगर डील में देरी होती है, लेकिन हमें एक बेहतर डील मिलती है तो यह उस स्थिति से बेहतर है जहां हम जल्दी से किसी ऐसी चीज पर सहमत हो जाएं जो भारत में बड़े व्यावसायिक और कमजोर समूहों को नुकसान पहुंचा सकती है।आशिमा गोयल, अर्थशास्‍त्री

हालांकि, एक्‍सपर्ट ने घरेलू संवेदनशीलता पर एक साफ रेखा खींची। गोयल ने कहा कि हम अपने किसानों की कीमत पर ऐसा नहीं करेंगे। इसलिए, उन्हें हमारी संवेदनशीलता को समझना होगा। उन्होंने बताया कि भारत के साथ संपन्न हुए कई मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) में एक-दूसरे की प्राथमिकताओं का सम्मान किया गया। विन-विन का परिणाम निकला। इसलिए, हम अमेरिका के साथ व्यापार डील में भी यही उम्मीद करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर डील में देरी होती है लेकिन हमें एक बेहतर डील मिलती है तो यह उस स्थिति से बेहतर है जहां हम जल्दी से किसी ऐसी चीज पर सहमत हो जाएं जो भारत में बड़े व्यावसायिक और कमजोर समूहों को नुकसान पहुंचा सकती है।

व्यापार डील पर बहस

इस हफ्ते की शुरुआत में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने सुझाव दिया था कि डील लगभग पूरी हो चुकी थी। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से फोन न करने के कारण यह सफल नहीं हो पाई। लुटनिक ने एक पॉडकास्ट में कहा था कि सब कुछ तय हो गया था। उन्होंने भारतीय पक्ष से कहा था कि मोदी को राष्ट्रपति को फोन करना चाहिए। लेकिन, वह ऐसा करने में असहज थे। इसलिए मोदी ने फोन नहीं किया।

हालांकि, भारत ने इस बात को खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ये टिप्पणियां 'सटीक' नहीं हैं। जायसवाल ने बताया कि भारत और अमेरिका पिछले साल 13 फरवरी को ही एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत करने के लिए प्रतिबद्ध थे। तब से दोनों पक्षों ने एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापार समझौते पर पहुंचने के लिए कई दौर की बातचीत की है। उन्होंने कहा कि कई मौकों पर हम डील के बहुत करीब थे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मोदी और ट्रंप ने पिछले साल आठ बार फोन पर बात की। इसमें उनकी व्यापक साझेदारी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई थी।

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