मिशन फेल होने के बाद अंतरिक्ष में खो गया ISRO का सैटेलाइट, जानिए कहां गिरता है मलबा? क्या आम लोगों को है खतरा

मिशन फेल होने के बाद अंतरिक्ष में खो गया ISRO का सैटेलाइट, जानिए कहां गिरता है मलबा? क्या आम लोगों को है खतरा

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भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ISRO को 2026 की शुरुआत में PSLV-C62 मिशन के साथ एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है. तकनीकी खराबी के कारण सैटेलाइट अपनी कक्षा तक नहीं पहुंच पाया.

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Updated: January 13, 2026 2:47 PM IST email india.com By Gaurav Barar email india.com twitter india.com Facebook india.com twitter india.com telegram india.com Follow Us india.com Follow Us मिशन फेल होने के बाद अंतरिक्ष में खो गया ISRO का सैटेलाइट, जानिए कहां गिरता है मलबा? क्या आम लोगों को है खतरा AI Image

ISRO Mission: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए साल 2026 की शुरुआत उम्मीदों के विपरीत रही. साल के पहले ही ऑर्बिटल मिशन, PSLV-C62 में एक गंभीर तकनीकी खराबी आ गई. हालांकि श्रीहरिकोटा से रॉकेट का प्रक्षेपण सफल रहा, लेकिन सैटेलाइट को जिस सटीक कक्षा में स्थापित होना था, वह वहां नहीं पहुंच पाया और अचानक ट्रैकिंग सिस्टम के रडार से गायब हो गया.

इस तरह की घटनाएं अंतरिक्ष विज्ञान में जोखिम का हिस्सा हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों की लागत वाला कोई सैटेलाइट मिशन फेल हो जाता है, तो उसका विशालकाय मलबा आखिर जाता कहां है? क्या यह पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के लिए खतरा है?

सुरक्षा के कड़े नियम

जब कोई रॉकेट या सैटेलाइट अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाता, तो इसरो और नासा जैसी एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन करती हैं. मुख्य उद्देश्य यह होता है कि गिरने वाला मलबा किसी रिहायशी इलाके, व्यस्त समुद्री रास्ते या हवाई यातायात को नुकसान न पहुंचाए. इसके लिए दो तरह की प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं.

पॉइंट नीमो- अंतरिक्ष का ‘कब्रिस्तान’

ज्यादातर नियंत्रित सैटेलाइट मलबे को ‘पॉइंट नीमो’ नामक स्थान पर गिराया जाता है. इसे स्पेसक्राफ्ट सिमेट्री या अंतरिक्ष का कब्रिस्तान भी कहा जाता है. ये दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित एक ऐसी जगह है जो किसी भी तट या महाद्वीप से हजारों किलोमीटर दूर है.

यहां कोई इंसानी बस्ती नहीं है और समुद्री जीवन भी न्यूनतम है. शिपिंग रूट्स और हवाई मार्गों से दूर होने के कारण यह मलबे को सुरक्षित रूप से ठिकाने लगाने के लिए दुनिया की सबसे उपयुक्त जगह मानी जाती है.

कंट्रोल्ड री-एंट्री

अगर मिशन कंट्रोल रूम का सैटेलाइट या रॉकेट के हिस्से पर थोड़ा भी नियंत्रण बचा होता है, तो वैज्ञानिक अंतिम उपलब्ध ईंधन का उपयोग करके उसे पृथ्वी के वायुमंडल में एक निश्चित कोण पर प्रवेश कराते हैं.

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वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय घर्षण के कारण पैदा होने वाली भीषण गर्मी से सैटेलाइट के अधिकांश हिस्से जलकर राख हो जाते हैं. जो बड़े टुकड़े बच जाते हैं, उन्हें सीधे पॉइंट नीमो के आसपास समुद्र में गिरा दिया जाता है.

अनकंट्रोल्ड री-एंट्री

संकट तब बढ़ता है जब सैटेलाइट से संपर्क पूरी तरह टूट जाता है और वह अनियंत्रित होकर पृथ्वी की ओर गिरने लगता है. ऐसी स्थिति में वह कहां गिरेगा, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल होता है.

हालांकि, पृथ्वी का 70% से अधिक हिस्सा पानी से ढका है और बहुत बड़ा भू-भाग निर्जन है, इसलिए सांख्यिकीय रूप से इसके किसी आबादी वाले क्षेत्र पर गिरने की संभावना बहुत कम होती है, फिर भी एजेंसियां दुनिया भर में अलर्ट जारी करती हैं.

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गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें

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