क्या भगवान को भी कर्मों का फल भोगना पड़ता है? - kya bhagwan par karma ka niyam lagu hota hai

क्या भगवान को भी कर्मों का फल भोगना पड़ता है? - kya bhagwan par karma ka niyam lagu hota hai

कर्म का सिद्धांत है कि मनुष्य जो भी करता है, एक दिन उसे उसका फल जरूर भोगना पड़ता है, चाहे वो अच्छा हो या बुरा। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति कुछ नहीं भी कर रहा होता है, तो भी वो मानसिक या किसी न किसी अन्य रूप में कर्म कर रहा होता है। इसलिए, ये तो तय है कि मनुष्य कर्मों से नहीं बच सकता और ना ही उसके परिणामों से। मनुष्य की आत्मा का विश्लेषण ही कर्मों के आधार पर होता है। लेकिन कई जिज्ञासुओं के मन में ये भी सवाल आता है कि क्या भगवान् को भी कर्मों का फल भोगना होता है? क्या वो भी कर्मों के नियम से बंधे हैं? तो, चलिए शास्त्रों के नजरिये से समझते हैं इसका जवाब...
क्या भगवान पर कर्म का नियम लागू होता है?

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं - “न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। अर्थात मुझे कर्म बाँधते नहीं हैं क्योंकि मुझे कर्मफल की इच्छा नहीं है"। कर्म का नियम उनपर लागू होता है, जो कर्मफल की इच्छा रखते हैं। ईश्वर ना तो कर्ता हैं और ना ही कर्मफल की उन्हें आवश्यकता है। वे अकर्ता हैं, इसलिए भोक्ता नहीं हैं। भगवान जीवों के कर्मों के साक्षी जरूर हैं, लेकिन वे स्वयं कर्म के बंधन में नहीं बंधते। जीव इच्छा से कर्म करता है और कर्मफल की अपेक्षा रखता है। जब तक जीव इस भौतिक संसार में है, खुद को जीवित रखने के लिए किसी न किसी रूप में कर्म करने के लिए बाध्य है और उसका फल भोगने के लिए भी। कर्म का नियम जीवों को संतुलन और न्याय देने के लिए है। इसलिए तो, गीता में यह भी कहा गया है कि कर्म करो लेकिन फल की चिंता मत करो। आप खुद को कर्म करने से नहीं रोक सकते लेकिन आप खुद को निष्काम कर्म करने के लिए जरूर तैयार कर सकते हैं, ताकि एक दिन आपको भी मोक्ष मिल जाए और इस कर्म के चक्र से मुक्ति भी।


क्या भगवान् के अवतार भी कर्मों के नियम में नहीं बंधे हैं?जब भगवान राम और कृष्ण के रूप में अवतार लेते हैं, तो वे मानव रूप में कर्म करते दिखते हैं। वे मानव रूप में वो सारे दुःख और सुख उठाते हैं, जो एक जीव को कर्म के परिणाम के रूप में भुगतना पड़ता है। उनका ये अवतार असाधारण होते हुए भी मानव जाति को कर्म का महत्व सिखाने के लिए कर्मों का परिणाम भुगतता है। वे भले ही ईश्वर हैं और लीलाएं कर सकते हैं लेकिन फिर भी कर्म के नियम के अनुसार आचरण करते हैं। जैसे भगवान् श्रीराम ने राजधर्म के लिए वनवास स्वीकार किया, वहीं श्रीकृष्ण ने युद्ध में कर्मयोग सिखाया। कर्म का नियम भले ईश्वर ने बनाया है लेकिन ईश्वर स्वयं उसका बंधन नहीं हैं। ये अलग बात है कि जब ईश्वर मानव रूप में आते हैं, तो वे भी कर्म का नियम नहीं तोड़ते बल्कि उसका सम्मान करते हैं। ईश्वर कर्म के नियम से ऊपर हैं, पर कर्म के नियम के विरुद्ध नहीं।

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