Luncancer:धूम्रपान की आदत लंग्स कैंसर की सबसे बड़ी वजह, तो क्या बच्चों को भी हो सकता है ये कैंसर? - Can Children Also Get Lung Cancer Doctors Explain The Rare Risk Kya Bacho Ko Fefdo Ka Cancer Hota Hai
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भारत में प्रदूषण, बदलती जीवनशैली, औद्योगीकरण और पर्यावरणीय जोखिमों के चलते लंग्स कैंसर में लगातार इजाफा देखा जा रहा है। ज्यादातर मरीजों में शुरुआती लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट होते हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।
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बच्चों में फेफड़ों का कैंसर (सांकेतिक)
- फोटो : Freepik.com
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कैंसर दुनियाभर में होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है। साल 2022-2023 में कैंसर से लगभग 10.4 मिलियन (1.04 करोड़) से अधिक लोगों की मौतें हुईं, जो दुनिया भर में हर छह मौतों में से लगभग एक के बराबर है। जिस तरह से इस रोग का वैश्विक ट्रेंड देखा जा रहा है, इसके आधार पर विशेषज्ञों की आशंका है कि साल 2050 तक जनसंख्या वृद्धि और उम्र बढ़ने के कारण कैंसर रोग से मौत के आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं।
अध्ययनों से पता चलता है धूम्रपान-शराब, खान-पान में गड़बड़ी और लाइफस्टाइल से संबंधित समस्याएं इस रोग के खतरे को बढ़ाती जा रही हैं। कैंसर के जिन प्रकारों को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सबसे ज्यादा चिंतित हैं उनमें स्तन, मुंह, पेट के कैंसर के साथ फेफड़ों के कैंसर प्रमुख हैं।
मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं, पुरुष और महिला दोनों में लंग्स कैंसर का खतरा हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बच्चे भी इसका शिकार हो सकते हैं?
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फेफड़ों का कैंसर
- फोटो : Freepik.com
क्या बच्चे भी हो सकते हैं फेफड़ों के कैंसर का शिकार?
लंग्स कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे धूम्रपान की आदत को प्रमुख माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, लगभग 85 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मामले सीधे तौर पर तंबाकू-धूम्रपान से जुड़े होते हैं। चूंकि बच्चे धूम्रपान नहीं करते हैं तो फिर भी वे लंग्स कैंसर का शिकार हो सकते हैं?
अध्ययनों की रिपोर्ट कहती है, फेफड़ों का कैंसर बच्चों में बहुत दुर्लभ होता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि बच्चों को इससे सुरक्षित माना जा सकता है।
बच्चों में यह बीमारी आमतौर पर जेनेटिक कारणों, रेडिएशन के संपर्क या गंभीर पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण हो सकती है।
इसके अलावा जो बच्चे लंबे समय धुएं और प्रदूषित हवा में रहते हैं उनमें भविष्य में फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
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लंग्स कैंसर का जोखिम
- फोटो : Adobe stock
बच्चों में फेफड़ों का कैंसर
मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं, बच्चों में बढ़ते कैंसर के मामले वैसे तो वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय हैं। हालांकि, बच्चों में होने वाले कैंसर में फेफड़ों के कैंसर की दर बहुत कम है।
बच्चों में होने वाले कैंसर में से लगभग 0.2 प्रतिशत मामले ही फेफड़ों का कैंसर के होते हैं।
नॉन-स्मॉल सेल लंग्स कैंसर के मामले बच्चों में अधिक देखे जाते हैं।
कैंसर की वजह बनने वाले जेनेटिक बदलाव हमें अपने माता-पिता से मिल सकते हैं, जिसका मतलब है कि वे जन्म से ही मौजूद होते हैं।
कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि सेकेंड हैंड स्मोकिंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों में फेफड़ों की समस्याओं का जोखिम हो सकता है, इससे कैंसर का भी जोखिम होता है।
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खांसी और फेफड़ों की दिक्कतें
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बच्चों में लंग्स कैंसर के क्या लक्षण होते हैं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ज्यादातर मामलों में लंग्स कैंसर के कोई भी लक्षण नहीं दिखाई देते। चूंकि बच्चों में फेफड़ों का कैंसर बहुत कम होता है, इसलिए जब लक्षण दिखते हैं, तो उन्हें दूसरी आम फेफड़ों की बीमारियों के लक्षण समझ लिया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, फेफड़ों की कुछ समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देते रहने की आवश्यकता होती है।
ऐसी खांसी जो ठीक न हो रही हो।
सीने में दर्द, ये खांसने या गहरी सांस लेने पर बढ़ सकती है।
सांस लेने में घरघराहट या आवाज में भारीपन
अक्सर थकान होना और भूख कम लगना।
बिना किसी वजह के वजन कम होना।
बार-बार निमोनिया या ब्रोंकाइटिस जैसे संक्रमण होना।
खांसी के साथ खून आना और सांस लेने में तकलीफ होना।
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बच्चों को कैंसर के खतरे से कैसे बचाएं?
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बच्चों को लंग्स कैंसर से कैसे बचाएं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, वैसे तो बच्चों में लंग्स कैंसर कम देखे जाते हैं हालांकि उन्हें इस बीमारी से सुरक्षित रखने के लिए तंबाकू के धुएं से बचाना सबसे जरूरी है।। प्रदूषित हवा और हानिकारक रसायनों के संपर्क से भी बच्चों को बचाएं। जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को लंग्स कैंसर रहा है उन्हें डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए, ताकि बच्चों को सुरक्षित किया जा सके।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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