नर्मदा अवतार कथा: जानिये भगवान शिव की पुत्री कैसे बनी मोक्षदायिनी नदी - mythological story narmada river origin katha

नर्मदा अवतार कथा: जानिये भगवान शिव की पुत्री कैसे बनी मोक्षदायिनी नदी - mythological story narmada river origin katha

भारत में कई पवित्र नदियाँ हैं लेकिन उनमें से कुछ को ही मोक्षदायिनी माना जाता है। उनमें से एक है नर्मदा। नर्मदा का उद्गम अमरकंटक पर्वत से होता है। यह नदी मध्यप्रदेश और गुजरात से होकर बहती है और अरब सागर में मिलती है। नर्मदा का प्रवाह शिव की ऊर्जा और तपस्या का प्रतीक है। नर्मदा नदी को हिंदू धर्म में जीवित देवी माना जाता है। नर्मदा की महत्ता इतनी अधिक है कि स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णन है कि नर्मदा में स्नान और दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि नर्मदा परिक्रमा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होने की साधना मानी जाती है। नर्मदा का इतना गहरा आध्यात्मिक महत्व होने के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो नर्मदा की उत्पत्ति भी बताती है। तो, चलिए जानते हैं...
नर्मदा नदी के उत्पत्ति की कथा

नर्मदा नदी के अवतार की कथा हिंदू धर्म की सबसे पवित्र और रहस्यमयी कथाओं में से एक है। नर्मदा को केवल नदी नहीं, बल्कि जीवित देवी और शिव की पुत्री माना गया है। उनकी उत्पत्ति की कथा तप, करुणा और मोक्ष से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, नर्मदा माता का जन्म भगवान शिव के पसीने की बूंदों से हुआ था, जब वे गहन तपस्या में लीन थे। इसीलिए नर्मदा को शिव की पुत्री और पवित्रता व मोक्ष की दायिनी कहा जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है कि भगवान शिव ने सहस्रों वर्षों तक गहन तप किया। तपस्या के दौरान उनके शरीर से पसीने की बूंदें गिरीं। उन्हीं बूंदों से नर्मदा नदी का अवतार हुआ। इसलिए नर्मदा को शिव की पुत्री और पवित्र नदी माना जाता है। गंगा में स्नान से पाप धुलते हैं, लेकिन नर्मदा दर्शन मात्र से ही पाप नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों में नर्मदा नदी की परिक्रमा को भी अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।


क्यों कहा जाता है नर्मदा को मोक्षदायिनी?

नर्मदा नदी की कथा यह दर्शाता है कि जब ईश्वर का तप करुणा में बदलता है, तब वह नदी बनकर संसार का कल्याण करता है। नर्मदा का तो उद्गम ही शिवजी से हुआ है और वो भी ऐसी परिस्थितियों में जहां तप और साधना की ऊर्जा भी उपस्थित थी। इसलिए, शास्त्रों में कहा गया है कि गंगा स्नान से पाप नष्ट होते हैं लेकिन नर्मदा के दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण नर्मदा परिक्रमा को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना गया है। जो भी नर्मदा की परिक्रमा श्रद्धा, नियम और विश्वास से करता है, वह केवल नर्मदा की परिक्रमा नहीं करता, बल्कि वह अपने भीतर के अहंकार, भय और अज्ञान की परिक्रमा करता है। एक मान्यता के अनुसार, सर्पों ने भगवान शिव से वर माँगा कि उन्हें मोक्ष प्राप्त हो। भगवान् शिव ने उन्हें नर्मदा के तट पर वास का वर दिया। इसलिए, नर्मदा के दोनों तटों पर प्राचीन शिवलिंग और नाग प्रतिमाएँ मिलती हैं।

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