Pli Auto Scheme:पीएलआई ऑटो स्कीम में बड़ा बदलाव, ईवी पात्रता हुई सख्त, जानें पांच मुख्य बातें - Pli Auto Scheme Amended: Govt Tightens Ev Eligibility, Aligns Incentives With Pm E-drive

Pli Auto Scheme:पीएलआई ऑटो स्कीम में बड़ा बदलाव, ईवी पात्रता हुई सख्त, जानें पांच मुख्य बातें - Pli Auto Scheme Amended: Govt Tightens Ev Eligibility, Aligns Incentives With Pm E-drive

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सरकार ने ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के लिए लागू प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) ऑटो स्कीम में आंशिक संशोधन अधिसूचित किए हैं। ये बदलाव 13 जनवरी 2026 से प्रभावी हो गए हैं। इन संशोधनों का मकसद इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) से जुड़ी पात्रता शर्तों को और स्पष्ट व सख्त बनाना है। साथ ही PLI (पीएलआई) स्कीम को सरकार की दूसरी प्रमुख ईवी योजना PM E-DRIVE (पीएम ई-ड्राइव) के साथ बेहतर तालमेल में लाना है। और पढ़ें loader Trending Videos यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं

EV पात्रता को लेकर अब क्या बदलेगा?
नए नियमों के तहत अब पीएलआई ऑटो स्कीम का लाभ केवल उन्हीं वाहनों को मिलेगा जो पूरी तरह बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV) होंगे। यानी हाइब्रिड या अन्य वैकल्पिक तकनीक वाले वाहन इस इंसेंटिव के दायरे में नहीं आएंगे। सरकार का फोकस अब पूरी तरह जीरो-एमिशन टेक्नोलॉजी पर है, ताकि ईवी सेक्टर में स्पष्ट दिशा तय की जा सके। विज्ञापन विज्ञापन

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PLI ऑटो स्कीम को PM E-DRIVE से कैसे जोड़ा गया है?

संशोधित पीएलआई ऑटो स्कीम को अब पीएम ई-ड्राइव के अनुरूप किया गया है। इसका मतलब यह है कि बैटरी इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर, ई-बस और ई-ट्रक के लिए इंसेंटिव नियम दोनों योजनाओं में एक जैसे होंगे। इससे कंपनियों को अलग-अलग स्कीम के नियम समझने में आसानी होगी और ईवी इकोसिस्टम में एकरूपता आएगी।

क्वाड्रिसाइकिल EV के लिए क्या नई शर्तें तय की गई हैं? बैटरी इलेक्ट्रिक क्वाड्रिसाइकिल (L7M और L7N श्रेणी) के लिए सरकार ने न्यूनतम तकनीकी मानक तय किए हैं। इन वाहनों की न्यूनतम रेंज 80 किलोमीटर होनी चाहिए। अधिकतम गति कम से कम 40 किमी प्रति घंटा तय की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इंसेंटिव केवल व्यवहारिक और उपयोगी ईवी को ही मिले।
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ब्रेकिंग सिस्टम और टेस्टिंग में क्या बदलाव किए गए हैं?

सुरक्षा और एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए कुछ तकनीकी शर्तें जोड़ी गई हैं। अब सभी पात्र ईवी में इलेक्ट्रिक जनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम अनिवार्य होगा, जिससे ब्रेक लगाने पर ऊर्जा दोबारा बैटरी में जा सके। वाहनों की टेस्टिंग चेसिस डायनामोमीटर पर, ग्रॉस व्हीकल वेट (GVW) में की जाएगी। टेस्ट के दौरान बैटरी का चार्ज लेवल 40 से 60 प्रतिशत के बीच होना जरूरी होगा। बिजली की खपत AIS-039 मानकों के अनुसार मापी जाएगी, ताकि वास्तविक उपयोग की स्थिति का सही आकलन हो सके।
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PLI ऑटो स्कीम का दायरा और उद्देश्य क्या है? पीएलआई ऑटो स्कीम को 15 सितंबर 2021 को मंजूरी दी गई थी। इसका कुल बजट 25,938 करोड़ रुपये है। यह स्कीम FY 2022-23 से FY 2026-27 तक लागू है। इसका लक्ष्य एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी (AAT) को बढ़ावा देना, गहरी लोकलाइजेशन को प्रोत्साहित करना और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है। स्कीम का मुख्य फोकस जीरो एमिशन व्हीकल्स, यानी बैटरी इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहनों पर है।
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अब तक स्कीम का प्रदर्शन कैसा रहा है?

30 नवंबर 2025 तक पीएलआई ऑटो स्कीम के तहत कुल 82 आवेदकों को मंजूरी दी जा चुकी है। इन कंपनियों की कई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स देशभर में AAT प्रोडक्ट्स बना रही हैं। अब तक 1,350.83 करोड़ रुपये की इंसेंटिव राशि सिर्फ पांच कंपनियों को जारी की गई है। जिससे साफ है कि सरकार इंसेंटिव देने में प्रदर्शन और पात्रता पर कड़ा जोर दे रही है।
सेल्स टारगेट और प्रमुख लाभार्थी कौन हैं? मार्च 2028 तक इस स्कीम के तहत पात्र बिक्री का लक्ष्य 2,31,500 करोड़ रुपये तय किया गया है। सितंबर 2025 तक करीब 32,879 करोड़ रुपये की बिक्री हासिल की जा चुकी है। इस स्कीम से टाटा मोटर्स, बजाज ऑटो, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टीवीएस मोटर, ओला इलेक्ट्रिक और टोयोटा किर्लोस्कर ऑटो पार्ट्स जैसी बड़ी कंपनियों को लाभ मिला है।
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लोकलाइजेशन पर सरकार कितना जोर दे रही है?

पीएलआई ऑटो स्कीम के तहत केवल वही उत्पाद इंसेंटिव के पात्र हैं, जिनमें कम से कम 50 प्रतिशत घरेलू वैल्यू एडिशन (DVA) हो। इससे ईवी और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में लोकल मैन्युफैक्चरिंग, घरेलू सप्लायर्स और भारतीय वैल्यू चेन को मजबूती मिल रही है।

कुल मिलाकर इन बदलावों का क्या मतलब है?
पीएलआई ऑटो स्कीम में किए गए ये संशोधन साफ संकेत देते हैं कि सरकार अब ईवी सेक्टर में सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता, परफॉर्मेंस और लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा केंद्रित कर रही है। सख्त मानकों के चलते अब वही कंपनियां इंसेंटिव का लाभ उठा पाएंगी। जो तकनीक और घरेलू उत्पादन दोनों मोर्चों पर मजबूत साबित होंगी। 

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