सोमनाथ:कई हमलों में हजारों भक्त मारे गए, पुनर्निर्माण पर नेहरू और पटेल-प्रसाद टकराए, जानें कैसे मौजूदा स्थिति - Pm Narendra Modi Takes Part In Somnath Swabhiman Parv Know History Of Temple Desecrated Time Nehru Patel

सोमनाथ:कई हमलों में हजारों भक्त मारे गए, पुनर्निर्माण पर नेहरू और पटेल-प्रसाद टकराए, जानें कैसे मौजूदा स्थिति - Pm Narendra Modi Takes Part In Somnath Swabhiman Parv Know History Of Temple Desecrated Time Nehru Patel

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने पहुंचे। पीएम ने यहां मंदिर में पूजा-अर्चना की। इससे पहले शनिवार शाम भी पीएम ने मंदिर में दर्शन किए थे। गौरतलब है कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 8 से 11 जनवरी 2026 तक आयोजित किया गया है और यह 1026 में महमूद गजनवी के पहले हमले की 1000वीं वर्षगांठ के अवसर पर मनाया जा रहा है। इतना ही नहीं इस मंदिर में 1 मई 1951 को पुनर्निर्माण के बाद प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। उस घटनाक्रम के भी 75 वर्ष पूरे होने की वजह से इस साल सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की अपनी अलग छटा है।  और पढ़ें loader Trending Videos यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं

पीएम मोदी ने शनिवार को गुजरात पहुंचने के साथ ही एक्स पर एक पोस्ट भी किया था। उन्होंने लिखा था, "सोमनाथ में आकर धन्य महसूस कर रहा हूं, जो हमारी सभ्यतागत साहस का गौरवशाली प्रतीक है।" प्रधानमंत्री ने समारोह से पहले अपने स्वागत के लिए आभार प्रकट करते हुए कहा, "यात्रा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान हो रही है। पूरा देश 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले की एक हजारवीं वर्षगांठ मनाने के लिए एकजुट हुआ है।" विज्ञापन विज्ञापन

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर सोमनाथ मंदिर में स्वाभिमान पर्व का महत्व क्या है? इस मंदिर का पूरा इतिहास क्या है? कैसे हजारों वर्षों में आक्रांताओं के हमलों, मंदिर को कई बार तोड़े और गिराए जाने के बावजूद यह मंदिर आज अपने मौजूदा स्वरूप में पहुंचा? इसे लेकर भारत की आजादी के बाद का इतिहास क्या रहा है? आइये जानते हैं...

 

सोमनाथ मंदिर कहां है और कब बना था?

सोमनाथ मन्दिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बन्दरगाह में स्थित एक अत्यन्त प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मन्दिर है। इसे भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है।

सोमनाथ ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, यह मंदिर कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है। सोमनाथ मंदिर का समय 649 ईसा पूर्व से पता लगाया जा सकता है लेकिन माना जाता है कि यह उससे भी पुराना है। 

कहा जाता है कि सोमराज (चंद्र देवता) ने सबसे पहले सोमनाथ में सोने से बना एक मंदिर बनवाया था। इसका पुनर्निर्माण रावण ने चांदी से, कृष्ण भगवान ने लकड़ी से और भीमदेव ने पत्थर से किया था। कालांतर में मंदिर ने अपने आकर्षण और समृद्धि की वजह से कई आक्रांताओं के हमले झेले। 

हिंदू ग्रंथों में क्या है सोमनाथ मंदिर का इतिहास?

हिंदुओं का पवित्र स्थल सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला माना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित वेरावल बंदरगाह के पास स्थित इस मंदिर की मौजूदगी का जिक्र ऋग्वेद में भी मिलता है।

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कलियुग: राजा भीमदेव सोलंकी ने इस मंदिर को पत्थर की कारीगरी से बनवाया। पुरातन खोजों से अब तक यह बात सामने आई है कि साल 1026 में महमूद गजनवी के इस मंदिर पर हमले से पहले इसे तीन बार बनवाया जा चुका था। बाद में इस पर मुगलकाल तक करीब 17 हमले हुए।

इतिहास की किताबों में क्या है मंदिर का जिक्र?

इतिहास की किताबों की मानें तो सोमनाथ मंदिर आदिकाल से ही त्रिवेणी संगम (तीन नदियों- कपिला, हिरण और सरस्वती का संगम) होने की वजह से हिंदुओं का लोकप्रिय तीर्थस्थल था।

649 ईसवी: अमेरिकी धार्मिक इतिहासकार जे गॉर्डन मेल्टन ने मंदिर के इतिहास से जुड़ी जो जानकारी इकट्ठा की, उसके मुताबिक इस मंदिर का निर्माण प्राचीन समय में हुआ, जबकि मुख्य मंदिर के पास बना एक दूसरा मंदिर यादव राजा वल्लाभी ने 649 ईसवी में बनवाया।

725 ईसवी: सिंध क्षेत्र के अरब शासक अल-जुनायद ने गुजरात और राजस्थान पर आक्रमण के दौरान राजा वल्लाभी के बनवाए मंदिर को गिराया।

और फिर आक्रांताओं ने सोमनाथ पर किए हमले 
1026: बताया जाता है कि अरब यात्री अल बरूनी ने अपने यात्रा वृत्तांत में सोमनाथ मंदिर का विवरण लिखा था। इससे प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने सन 1024 में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। माना जाता है कि गजनवी ने उस दौर में 2 करोड़ दिनार यानी आज के करीब 500 करोड़ रुपए के बराबर की संपत्ति लूटी थी। यह भी माना जाता है कि महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमले के दौरान करीब 50 हजार भक्तों की हत्या कर दी थी।
 

1026-1042:

महमूद गजनवी के लौटने के बाद गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।

1299: सन 1297 में जब अलाउद्दीन खिलजी की दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे फिर तबाह किया गया। मंदिर में फिर लूटपाट हुई और अगले कुछ वर्षों तक यही सिलसिला जारी रहा।

1394: दिल्ली सल्तनत के इस मंदिर पर आक्रमण के बाद मंदिर को फिर से सौराष्ट्र के हिंदू राजा महिपाल-I ने बनवा दिया। फिर तीसरी बार 1394 में दिल्ली सल्तनत के मुजफ्फर शाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाया और सारा चढ़ावा लूट लिया। शाह के गुजरात का सुल्तान बनने के बाद यह मंदिर लंबे समय तक क्षतिग्रस्त हालात में रहा। इस बीच मंदिर को बीच-बीच में कई बार तोड़ा गया और हिंदू राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराना जारी रखा।

मुगलकाल में कई बार गिराया गया, हर बार उठ खड़ा हुआ
1665-1706:

मुगल शासन में मंदिर में कई बार तोड़फोड़ की गई। हालांकि, सोमनाथ मंदिर की इमारत में जो बड़ी तबाही की गई, वो 1665 से लेकर 1706 के बीच औरंगजेब के समय में हुई। दरअसल, 1665 में जब इस मंदिर को तोड़ने के बाद भी भक्तों का यहां आना कम नहीं हुआ, तो औरंगजेब ने सैन्य टुकड़ी भेजी और बड़ी संख्या में लोगों को मरवा दिया। बताया जाता है कि इसके बाद 18वीं सदी के अंत तक यह मंदिर क्षतिग्रस्त रहा।

1780: इतिहास की किताबों में जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर ने औरंगजेब के शासन में तबाह किए गए ज्योतिर्लिंगों वाले कई मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। इनमें उत्तर प्रदेश में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर, महाराष्ट्र के घृष्णेश्वर मंदिर प्रमुख रहे। बताया जाता है कि जब अहिल्याबाई सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराने पहुंचीं, तो इस पर हमले की आशंका के चलते उन्होंने पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं कराया, बल्कि इससे कुछ दूरी पर ही एक अलग मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि ऐसा करने के पीछे उनका मकसद ध्वस्त मंदिर को भविष्य में हो सकने वाली टूट-फूट से बचाना था, ताकि लोगों का इस पर ध्यान ही न जाए।

अंग्रेजों के शासन के बाद सरदार पटेल ने उठाया पुनर्निर्माण का बीड़ा

1947:

भारत पर अंग्रेजों के तकरीबन 200 वर्षों के राज के दौरान सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर किसी का ध्यान नहीं गया। हालांकि, 13 नवंबर 1947 को पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने तबाह हुए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया। इसमंदिर के निर्माण के लिए तब आर्किटेक्ट प्रभाशंकर सोमपुरा को बुलाया गया और सोमनाथ से 28 किमी दूर चोरवाड से चूनापत्थर मंगाए गए। पत्थरों को 'नागर' शैली में तराशा गया। 

जब केएम मुंशी ने सरदार पटेल के साथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव देने के लिए महात्मा गांधी से संपर्क किया तो गांधी जी सहमत हो गए, लेकिन उन्होंने कहा कि सरकार को नहीं, बल्कि लोगों को खर्च वहन करना चाहिए। इसके बाद मुंशी को अध्यक्ष बनाकर एक ट्रस्ट बनाया गया।

भारत सरकार और सौराष्ट्र सरकार के न्यासी बोर्ड में दो-दो प्रतिनिधि शामिल थे। मुंशी की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति की स्थापना की गई और पुरातत्व महानिदेशक को संयोजक बनाया गया। 1950 में सरदार पटेल की मृत्यु के बाद मंदिर के निर्माण की जिम्मेदारी मुंशी के कंधों पर आ गई। हालांकि, इसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुंशी द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण को भारत सरकार से जोड़ने का विरोध किया। 

जानी-मानी इतिहासकार रोमिला थापर अपनी पुस्तक 'सोमनाथ दी मेनी वॉइसेस ऑफ हिस्ट्री' में लिखती हैं, 'प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस तथ्य का खंडन किया था कि मंदिर का पुनर्निर्माण भारत सरकार कर रही है। नेहरू के लिए ऐसी गतिविधि सरकारी गतिविधि के रूप में मंजूर नहीं थी और एक धर्मनिरपेक्ष देश पर शासन करने वाली धर्मनिरपेक्ष सरकार की नीति के लिए अहितकर थी।'

पंडित नेहरू को क्यों पसंद नहीं आया मंदिर का पुनर्निर्माण?

केएम मुंशी ने अपनी एक किताब- द श्राइन इटरनल (1976) में इस विवाद का जिक्र करते हुए कहा था, "मैं दिसंबर 1922 में एक टूटे तीर्थस्थल के दौरे पर गया। वह तबाह और जला हुआ था, लेकिन मजबूती के साथ खड़ा था।" मुंशी के मुताबिक, अक्तूबर 1947 में जब जूनागढ़ का भारत में विलय हुआ, तब सरदार पटेल ने उनसे कहा था, 'जय सोमनाथ'। इसके बाद पटेल ने मुंशी की देखरेख में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू कराया।

मुंशी के मुताबिक, सोमनाथ का पुनर्निर्माण देश से किया गया एक वादा था। हालांकि, जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें बुलाकर कहा कि उन्हें सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की कोशिश बिल्कुल पसंद नहीं है। यह एक तरह से हिंदू पुनर्जागरण की कोशिश है। माना जाता है कि नेहरू मंदिर के खिलाफ नहीं थे, लेकिन उनके धर्मनिरपेक्ष विचारों में मंदिर का निर्माण उस वक्त अनुचित था।

जानी-मानी इतिहासकार रोमिला थापर अपनी पुस्तक 'सोमनाथ दी मैनी वॉइसेज ऑफ हिस्ट्री' में लिखती हैं- 2 मई 1951 को मुख्यमंत्रियों को संबोधित एक पत्र में नेहरू ने कहा, 'आपने सोमनाथ मंदिर में होने वाले समारोहों के बारे में पढ़ा होगा। कई लोग इसकी तरफ आकर्षित हुए हैं और मेरे कुछ सहयोगी तो व्यक्तिगत हैसियत से भी इससे जुड़े हैं। लेकिन यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि यह कार्य सरकारी नहीं है और भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। हमें यह याद रखना होगा कि हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष होने के रास्ते में आए। यह हमारे संविधान का आधार है और इसलिए सरकारों को ऐसी किसी भी चीज से खुद को जोड़ने से बचना चाहिए जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को प्रभावित करती हो।'

...और जब राष्ट्रपति ने पीएम नेहरू की सलाह को कर दिया अनसुना
1951:

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर का अनावरण करने जा रहे थे, तब नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से रोका, लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की सलाह को अनसुना कर दिया और मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए। नेहरू का तर्क था कि जनसेवक खुद को पूजा स्थलों से न जोड़ें। वहीं, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि सभी धर्मों को बराबरी का आदर मिले।

इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के मुताबिक, 2 मई 1951 को नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी और कहा कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को भेजी चिट्ठी में कहा, "मुझे अपने धर्म पर पूरा भरोसा है और मैं खुद को इससे अलग नहीं कर सकता।" आखिरकार 11 मई 1951 को राष्ट्रपति ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया।

इस दौरान कुछ गुजराती समाचार पत्रों ने लिखा कि सौराष्ट्र सरकार ने मंदिर के निर्माण में करीब पांच लाख रुपये की धनराशि का योगदान दिया है। इन रिपोर्टों से भी नेहरू नाखुश थे। मंदिर के उद्घाटन के बाद भी  कई साल तक इसका पुनर्निर्माण चलता रहा। 
 

मंदिर की आधारशिला रखने के 45 साल बाद पूरा हुआ पुनर्निर्माण 

सोमनाथ ट्रस्ट के अनुसार, 1 दिसंबर 1995 को सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा हुआ था। उस वक्त देश के राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने यह मंदिर देश को समर्पित किया। वर्तमान में ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जबकि सरदार पटेल इस ट्रस्ट के पहले अध्यक्ष थे।

2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के लिए कई अलग-अलग परियोजनाओं का वर्चुअल तौर पर उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान कहा कि यह स्थान आज भी पूरे विश्व के सामने यह आह्वान कर रहा है कि आस्था को आतंक से कुचला नहीं जा सकता। मोदी के भाषण को अफगानिस्तान के ताजा हालात पर टिप्पणी के तौर पर भी देखा गया, जहां तालिबान अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक प्रतीकों को खत्म करने में जुटा है।

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