स्पेस मिशन फेल होने पर किसे उठाना पड़ता है घाटा? इसरो के PSLV-C62 मिशन से समझिए पूरा मामला
Hindi India HindiIsro Pslv C62 Mission Failed Who Bears Loss Of Such Events स्पेस मिशन फेल होने पर किसे उठाना पड़ता है घाटा? इसरो के PSLV-C62 मिशन से समझिए पूरा मामला
इसरो के PSLV-C62 मिशन की विफलता से करोड़ों का वित्तीय नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई सरकारी बजट और कुछ हद तक स्पेस इंश्योरेंस के माध्यम से की जाने की चर्चा है. इस मिशन के बाद इसरो के कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट पर भी असर पड़ने की संभावना है.
Published: January 13, 2026 5:15 PM IST
By Satyam Kumar
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ISRO PSLV-C62 (इमेज AI से है)
अंतरिक्ष में अपने यान भेजना जितना रोमांचक है, उतना ही जोखिम भरा भी. हाल ही में इसरो के पीएसएलवी-सी62 मिशन की विफलता ने न केवल वैज्ञानिकों को निराश किया है, बल्कि देश के खजाने पर भी बड़ा बोझ डाला है. पीएसएलवी-सी62 मिशन का मुख्य उद्देश्य एक महत्वपूर्ण अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करना था. रॉकेट के ऊपरी चरण में आई तकनीकी खराबी के कारण मिशन विफल हो गया और उपग्रह निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका. इस विफलता का मतलब सिर्फ डेटा का नुकसान नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और करोड़ों रुपये के निवेश का शून्य हो जाना है. आइए समझते हैं कि इस तरह के बड़े नुकसान की भरपाई कैसे की जाती है.
कितना बड़ा है आर्थिक नुकसान?
एक पीएसएलवी मिशन की लागत रॉकेट और सैटेलाइट की जटिलता के आधार पर 150 से 250 करोड़ रुपये के बीच होती है. यदि इसमें विदेशी ग्राहकों के पेलोड शामिल हों, तो विदेशी मुद्रा का नुकसान और भी बढ़ जाता है. अरबों डॉलर के इस नुकसान में सैटेलाइट निर्माण की लागत, रॉकेट फ्यूल, लॉन्च पैड ऑपरेशंस और वैज्ञानिकों की सालों की मैन-पावर शामिल होती है.
क्या स्पेस इंश्योरेंस का बीमा होता है?
आमतौर पर इसरो अपने राष्ट्रीय मिशनों (जैसे चंद्रयान या मंगलयान) का बीमा नहीं करवाता है, क्योंकि इनका प्रीमियम बहुत अधिक होता है. सरकार खुद इस जोखिम को वहन करती है. हालांकि, जब इसरो न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के जरिए कमर्शियल लॉन्च करता है, तो विदेशी ग्राहकों के सैटेलाइट्स का बीमा (Space Insurance) कराया जाता है. विफलता की स्थिति में बीमा कंपनियां ही नुकसान का एक बड़ा हिस्सा कवर करती हैं.
बता दें कि इंश्योरेंस कंपनियां, बीमा क्लेम एप्रूव करने से पहले कई चीजों पर विचार करती है. अगर रॉकेट में गड़बड़ी होने, लॉन्च के समय रॉकेट फटने की वजह से मिशन फेल हुआ है तो वह पूरा पैसा भरपाई करेगी. लेकिन अगर सैटेलाइट सफलतापूर्वक अलग हो जाते हैं और किसी अंजान वजह से अपनी कक्षा में शामिल नहीं हो पाते हैं तो ऐसे में इंश्योरेंस कंपनी क्लेम एप्रूव करने से इंकार कर सकती है. ध्यान देने वाली बात है कि इंश्योरेंस क्लेम के टर्म्स एंड कंडीशन्स इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.
कौन चुकाएगा इसका हर्जाना?
राष्ट्रीय मिशनों के लिए फंड सीधे भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) द्वारा आवंटित किया जाता है. विफलता की स्थिति में यह पैसा करदाताओं (Taxpayers) के हिस्से से जाता है, लेकिन यदि मिशन कमर्शियल है, तो कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार NSIL को हर्जाना देना पड़ सकता है या अगले लॉन्च में छूट देनी पड़ सकती है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि बीमा कंपनियां केवल उन्हीं हिस्सों का भुगतान करती हैं जिनका प्रीमियम भरा गया हो. इस तरह की विफलता इसरो की साख (Credibility) पर असर डालती है, जिससे भविष्य के कमर्शियल ऑर्डर्स कम हो सकते हैं. नुकसान की भरपाई केवल पैसों से नहीं, बल्कि तकनीकी सुधारों से की जाती है ताकि अगली बार ऐसी चूक न हो. इसरो की फेल्योर एनालिसिस कमेटी अब हर उस पुर्जे की जांच करेगी जिसने धोखा दिया, ताकि आने वाले अरबों के निवेश को सुरक्षित किया जा सके.
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About the Author

Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
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