Russia Northern Sea Route India China Greenland,ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहता है अमेरिका, भारत संग आर्कटिक के लिए रूस के पास मास्टरप्लान, क्यों झिझक रही दिल्ली? - russia india cooperation in arctic putin want india in northern sea route importance china bri confusion - Rest of Europe News
डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक में बन रहे नये समुद्री कॉरिडोर पर कंट्रोल करने के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए बल प्रयोग की संभावना से इनकार नहीं किया है। लेकिन इस बीच रूस इस क्षेत्र में एक नया गेम प्लान खेलने के मूड में है। और वो है नॉर्थ सी रूट। साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में हिस्सा लेने व्लादिवोस्तोक गये थे, उस वक्त उनकी यात्रा को भारत की आर्कटिक नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया था। इस यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की एक्ट फार ईस्ट नीति लॉन्च की थी और आर्कटिक में विकास परियोजनाओं के लिए 1 बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन की घोषणा की थी।
मोदी के उस दौरे के बाद आर्कटिक में भारत और रूस के बीच सहयोग काफी बढ़ा है। जिसमें सीमित वैज्ञानिक आदान-प्रदान को बढ़ाकर 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' कर दिया गया। आर्कटिक में भारत के साथ जुड़ाव को रूस मजबूती से बढ़ाना चाहता रहा है, लेकिन नई दिल्ली की तरफ से, आर्कटिक में बेहतर जुड़ाव के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति में आपसी तालमेल की कमी रही है। आर्कटिक ना सिर्फ भारत को रूस के साथ अपने जुड़ाव को तेजी से बढ़ाने का रास्ता खोलता है, बल्कि यह भारत के लिए इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने का सही समय है, जिसके रणनीतिक फायदे होंगे।
पिछले साल दिसंबर में पुतिन के भारत दौरे से पहले रूसी संसद ने दी थी RELOS को मंजूरी
नॉर्दर्न सी रूट पर भारत रूस के साथ आएगा?
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के एसोसिएट फेलो प्रवेश कुमार गुप्ता ने हिंदुस्तान टाइम्स में इसको लेकर एक लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है कि मौजूदा समय में जियो-पॉलिटिकल स्थिति तेजी से बदली है, जिसने शक्तिशाली देशों को वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने पर मजबूर किया है। ग्लोबल वॉर्मिंग ने आर्कटिक में सदियों से जमे बर्फ को तेजी से पिघलाना शुरू कर दिया है और कई वैज्ञानिक रिपोर्ट्स में भविष्यवाणी की गई है कि 2035 तक गर्मियों के मौसम में इस क्षेत्र में पूरी तरह से बर्फ पिघल सकता है। जिससे नॉर्दर्न सी रूट (NSR) काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, जो भारत को एक ज्यादा सुरक्षित व्यापार मार्ग प्रदान करता है। स्वेज नहर जैसे पारंपरिक मार्गों में खतरों को देखते हुए भारत के लिए ये एक सुरक्षित व्यापार मार्ग होगा। हालिया समय में इसको लेकर रूस ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जैसे दिसंबर 2025 का रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (RELOS) समझौता। रूसी संसद ने राष्ट्रपति पुतिन की दिल्ली यात्रा से ठीक पहले इसे मंजूरी दी थी। इस समझौते से भारत को एक बार में अपने पांच युद्धपोत और कम से कम 3000 सेना के जवानों को रूस के आर्कटिक नौसैनिक बंदरगाहों तक जाने का रास्ता खोसता है। ये समझौता पांच सालों के लिए है, जिसे आगे जाकर दोनों पक्षों की सहमति से बढ़ाया जा सकता है। RELOS समझौते का मुख्य आधार आर्कटिक को लेकर ही है। इसीलिए अगर भारत और रूस के बीच के सैन्य और आर्थिक संबंधों को अगले 10 सालों के लिए देखा जाए, तो आर्कटिक इसमें महत्वपूर्ण भूमिक निभाता है।
इससे भारत को भारी फायदे हो सकते हैं। इससे भारत और रूस के बीच का द्विपक्षीय व्यापार दोगुना हो सकता है। दोनों देशों ने साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर के पार पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। लिहाजा आर्कटिक और नॉर्दर्न सी रूट भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण बन गया है। इसके अलावा अगर एनर्जी, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के साथ-साथ स्ट्रेटेजिक पहलू की वजह से आर्कटिक प्रोजेक्ट्स का और विस्तार होता है, तो यह बढ़कर 200 अरब डॉलर तक हो सकता है।
ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप
रूस के आर्कटिक कार्यक्रम में चीन भी है शामिल
नॉर्दर्न सी रूट (NSR) रूस के उत्तरी तट के किनारे 5,600 किलोमीटर लंबा आर्कटिक शिपिंग कॉरिडोर है। ये अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ता है। यह स्वेज नहर के रास्ते पारंपरिक रास्तों से काफी छोटा है, जिससे यूरोप और एशिया के बीच यात्रा का समय 40-50% तक कम हो जाता है। इसीलिए इस साल की शुरूआत से ही रूस, NSR को एक मुख्य ग्लोबल ट्रेड रूट के तौर पर शुरू करने के लिए चीन और भारत के साथ सक्रिय रूप से साझेदारी कर रहा है। चीन इसमें एक बड़ा स्टेकहोल्डर है और वो 'पोलर सिल्क रोड' फ्रेमवर्क के तहत NSR को अपनी बेल्ट एंड रोड पहल से इंटीग्रेट कर रहा है।
अक्टूबर 2025 में रूस और चीन ने आधिकारिक तौर पर NSR के साथ सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट के लिए एक रोडमैप को मंजूरी दी थी। इसके बाद 2025 में NSR के जरिए रूस और चीन के बीच कंटेनर शिपिंग में काफी तेजी आ चुकी है। ये रिकॉर्ड वॉल्यूम 400,000 टन से ज्यादा हो गया है। चीन इस रास्ते का इस्तेमाल भारत के प्रभाव वाले मलक्का जलडमरूमध्य और भीड़भाड़ वाली स्वेज नहर से बचने के लिए कर रहा है। लिहाजा सवाल ये उठ रहे हैं कि चीन की मौजूदगी के बीच क्या रूस के साथ भारत इस प्रोजेक्ट में खुलकर साथ आएगा, जिसके भविष्य में भारी आर्थिक और रणनीतिक फायदे होने की उम्मीद है?