Saudi Arabia Uae Pakistan Geo Politics,तेल में बह रही सऊदी की अर्थव्यवस्था, नियोम ने इकोनॉमी का निकाला दिवाला, प्रिंस सलमान अचानक झगड़ालू क्यों बने? - saudi arabia uae middle east conflict story crude oil economy collapse turkey pakistan influence - Uae News
सऊदी अरब ने पिछले कुछ महीनों से मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सहयोगी देशों से दूरी बना ली है। गहराई से देखने पर पता चलता है कि देश एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जो 2030 तक देश को आधुनिक बनाना चाहते थे, वो अचानक से मुस्लिम ब्रदरहुड से दोस्ती बढ़ाने लगे हैं और जायोनिज्म के खिलाफ हो गये हैं। पिछले हफ्ते पता चला है कि सऊदी अरब ने ट्रंप प्रशासन से ईरान पर हमला नहीं करने के लिए लॉबिंक की थी। जबकि ईरान और सऊदी के बीज 1979 से गहरी दुश्मनी रही है। यमन में जबसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) आमने-सामने आए हैं, उसके बाद सऊदी काफी तेजी से बदल गया है। सऊदी अरब एयरफोर्स ने संयुक्त अरब अमीरात के यमन में ठिकानों पर हमला किया, जिससे यमन के मुस्लिम ब्रदरहुड के अल-इस्लाह के लिए अदन की ओर दक्षिण में विस्तार करने का रास्ता साफ हो गया है।
सऊदी अरब में आया ये परिवर्तन कोई अबूझ पहेली नहीं है। सऊदी अरब ने सूडान में उस क्वाड प्लान को छोड़ दिया, जिसपर उसने दस्तखत किए थे। इसमें शर्त ये थी कि दोनों युद्ध करने वाले जनरल, सूडानी आर्म्ड फोर्सेज (SAF) के चीफ अब्दुल-फतह अल-बुरहान और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के लीडर मुहम्मद डगलो "हेमेती", युद्धविराम करें और देश की सत्ता को नागरिक नेताओं के हवाले कर दें। सऊदी अरब ने पाकिस्तान के उस हथियार डील के लिए फंड करने की घोषणा की है, जिसके तहत पाकिस्तान करीब 1.5 अरब डॉलर के हथियार बुरहान की सेना को बेचेगा। सऊदी इस डील के बदले पाकिस्तान का लोन माफ करेगा।![]()
मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन क्यों कर रहा सऊदी?
मिडिल ईस्ट के रिसर्चर हुसैन अब्दुल हुसैन फाउंडेशन फॉर द डिफेंस डेमोक्रेसीज के रिसर्चर हैं। उन्होंने नेशनल इंटरेस्ट में एक लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है कि बुरहान उमर अल-बशीर के मुस्लिम ब्रदरहुड शासन का आदमी है। बशीर ने अल-कायदा के आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को तब पनाह दी थी जब उसने केन्या और नैरोबी में अमेरिकी दूतावासों और अदन की खाड़ी में USS कोल पर हमलों की योजना बनाई थी। हेमेती की तरह, बुरहान पर भी अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं। ये सूडानी इस्लामिक मूवमेंट और उसके मिलिशिया के साथ गठबंधन में है। जैसे ही इजरायल ने सोमालीलैंड को मान्यता दी, सऊदी अरब भड़क उठा। उसने अपना गुस्सा UAE पर निकाला और उसने इजरायल के साथ साथ UAE पर भी जॉयोनी प्रोजेक्ट को लागू करने का आरोप लगा दिया।हुसैन अब्दुल हुसैन ने लिखा है कि 2015 में सऊदी अरब की सत्ता संभालने वाले मोहम्मद बिन सलमान ने खुद को एक समाज सुधारक के तौर पर पेश किया था। उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया है। अल-रियाद अखबार के एक संपादकीय में कहा गया है कि "जहां भी इजरायल मौजूद है, वहां बर्बादी और विनाश है। वो ऐसी नीतियां अपनाता है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, मानवाधिकारों को मान्यता नहीं देती हैं और देशों की संप्रभुता या उनके क्षेत्रों की अखंडता का सम्मान नहीं करती हैं, जबकि संकटों और संघर्षों का फायदा उठाकर विभाजन को गहरा करने का काम करती हैं।" सऊदी अरब की सरकारी मीडिया ने ना सिर्फ इजरायल, बल्कि अमेरिका की भी जमकर बुराई की है और इसे देखकर कतर और तुर्की भी हैरान रह गये। सऊदी अरब के कई एक्सपर्ट्स ने सीधे अमेरिका पर ही निशाना साधा। ओकाज़ में रामी अल-अली ने लिखा कि "ट्रंप का सिद्धांत एक ऐसे दौर को दिखाता है जिसमें टेक्नोलॉजिकल और इन्फॉर्मेशनल सुपीरियरिटी का फायदा उठाकर एक नई राजनीतिक सच्चाई थोपी जाती है, जो (उनकी) दक्षिणपंथी लोकलुभावन विचारधारा के साथ मेल खाती है।"
सऊदी के अखबारों में कतर और तुर्की से करीबी संबंध, UAE से दूरी, इजरायल से नफरत करने वाले संपादकीय लिखे जा रहे हैं। जाहिर तौर पर ऐसे लेख प्रिंस सलमान की मर्जी से लिखे जा रहे हैं। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों?
सऊदी अरब अचानक झगड़ालू क्यों हो रहा?
इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह आर्थिक नाकामी है। अरबों डॉलर का नियोम प्रोजेक्ट बुरी तरह से फेल हो गया है। प्रिंस सलमान के विजन-2030 में अब सिर्फ 4 साल बचे हैं। लेकिन सऊदी, अपनी तेल आधारित अर्थव्यवस्था को बदलने में नाकाम रहा है। तेल अभी भी सऊदी अरब की इकोनॉमी में 45 प्रतिशत से ज्यादा योगदान दे रहा है, जबकि UAE ने इसे घटाकर 22 प्रतिशत के नीचे कर लिया है। दूसरी तरफ देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और कच्चे तेल की कीमत लगातार कम हो रही है। दुनिया के ज्यादातर देश तेल को छोड़ने के लिए प्लान बना रहे हैं। इलेक्ट्रिक कारें अब भारत जैसे देशों की सड़कों पर दिखना काफी आम हो चुकी हैं। ऐसा ही हाल सिंगापुर, चीन, जापान के साथ साथ कई दूसरे देशों में भी।
सऊदी अरब को अगर अपने देश की अर्थव्यवस्था को संभालना है तो उसे तेल कम से कम 96 डॉलर प्रति बैरल बेचना होगा, लेकिन इंटरनेशनल मार्केट में तेल सिर्फ 60-65 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा है, जिससे सऊदी अरब का घाटा बढ़कर 65 अरब डॉलर को पार कर गया है। तेल की कीमत बढ़ाने की सऊदी अरब की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं। यूक्रेन युद्ध और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध की वजह से भारत और चीन को जबरदस्त फायदा हुआ और इन दोनों देशों ने सऊदी अरब के महंगे तेल को खरीदना काफी कम कर दिया है। वेनेजुएला का तेल अब बाजार में आने वाला है, जिससे तेल की कीमत में और कमी आएगी और सऊदी के ग्राहक, वेनेजुएला की तरफ जाएंगे। इसमें डोनाल्ड ट्रंप का प्रेशर भी शामिल होगा।
इसीलिए घरेलू असंतोष को दबाने के लिए इस्लामिक कार्ड खेलना सबसे बेहतरीन विकल्प है। घरेलू नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए धर्म से बेहतर अफीम शायद ही कुछ है। सऊदी भी उसी रास्ते पर है। पाकिस्तान उसे पट्टी भी पढ़ा रहा है। इसीलिए हुसैन अब्दुल हुसैन ने लिखा है कि अगर सऊदी इसी रास्ते पर चलता रहा तो धीरे धीरे वो कतर और तुर्की जैसा हो जाएगा और कुछ सालों के बाद इस्लामी देश ईरान जैसा। तुर्की और ईरान इस्लामिक कार्ड फेंकने में माहिर हो चुके हैं, जिसे सऊदी ने गहराई से अपनाना शुरू कर दिया है।