Shattila Ekadashi 2026:षटतिला एकादशी आज, पाप नाश और अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला महाव्रत - Shattila Ekadashi Today 2025 Puja Vidhi Significance And Tithi In Hindi
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षटतिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत है, जिसे भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है और आत्मा की शुद्धि के साथ मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यह एकादशी केवल व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दान, सेवा और भक्ति का संगम है, जो भक्त को आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। मान्यता है कि षट्तिला एकादशी पर भगवान विष्णु स्वयं भक्तों के समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें सुख, शांति और अक्षय पुण्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि शरीर और मन की शुद्धि का भी माध्यम बनता है।
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1. षटतिला एकादशी का पौराणिक महत्व
पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताते हुए कहते हैं—“हे नृपश्रेष्ठ! माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘षटतिला’ या ‘पापहारिणी’ के नाम से विख्यात है, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है।” शास्त्रों में वर्णित है कि जितना पुण्य कन्यादान, हजारों वर्षों की तपस्या और स्वर्णदान से प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक पुण्य षट्तिला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। यह व्रत परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और जीवन में सकारात्मकता लाने में सहायक माना गया है।
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2. षटतिला एकादशी पर श्री हरि विष्णुजी की पूजा विधि
इस दिन प्रातः जल में तिल और गंगाजल डालकर स्नान करना चाहिए। शुद्ध होकर पवित्र भाव से देवाधिदेव श्री विष्णु भगवान का स्मरण करें। पंचामृत, पुष्प, तुलसी, चंदन, कपूर और तिल से बने नैवेद्य आदि सामग्री से शंख, चक्र, कमल और गदा धारण करने वाले जगत के पालनहार श्री हरि की विधिपूर्वक पूजा कर आरती करें। यदि पूजा में कोई त्रुटि हो जाए तो श्रीकृष्ण के नाम का उच्चारण करना चाहिए, क्योंकि नामस्मरण से सभी दोष दूर हो जाते हैं।
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3. अर्घ्य और स्तुति का विशेष विधानशास्त्रों के अनुसार इस दिन श्रीविष्णु भगवान को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य अर्पित कर उनकी स्तुति करनी चाहिए—“सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप बड़े दयालु हैं। हम आश्रयहीन जीवों के आप आश्रयदाता बनिए। हम संसार सागर में डूब रहे हैं, आप हम पर प्रसन्न होइए। कमलनयन! विश्वभावन! सुब्रह्मण्य! महापुरुष! सबके पूर्वज! जगत्पते! मेरा दिया हुआ अर्घ्य आप लक्ष्मीजी के साथ स्वीकार करें।”इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। रात्रि में भगवान के नाम का कीर्तन या भजन करना अत्यंत शुभ होता है।
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4. तिल दान का धार्मिक महत्व
मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न तिल और माता लक्ष्मी के प्रिय गन्ने के रस से बने गुड़ के मिष्ठान का दान करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को जल का घड़ा, तिल, छाता, जूता और गर्म वस्त्र दान करना उत्तम माना गया है। दान करते समय यह भावना रखें—“इस दान के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों।” तिल से बने व्यंजन या तिल से भरा पात्र दान करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
5. षटतिला एकादशी क्यों कहलाती है ‘षटतिला’
शास्त्रों के अनुसार इस दिन तिल के छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान है—तिल मिश्रित जल से स्नान करना, तिल से होम करना, तिल का उबटन लगाना, तिल मिला जल पीना, तिल का दान करना और तिल को भोजन में उपयोग करना। इन्हीं छह कार्यों में तिल के प्रयोग के कारण यह एकादशी ‘षट्तिला’ कहलाती है। मान्यता है कि इस प्रकार व्रत करने से व्यक्ति दैहिक, दैविक और भौतिक—तीनों तापों से मुक्त रहता है और जीवन में सुख-शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।