Space Debris:धरती के बाहर 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से घूम रहा है 'टाइम बॉम', ठप कर सकता है इंटरनेट और Gps! - What Is Space Debris And How It Can Destroy Communication System On Earth

Space Debris:धरती के बाहर 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से घूम रहा है 'टाइम बॉम', ठप कर सकता है इंटरनेट और Gps! - What Is Space Debris And How It Can Destroy Communication System On Earth

विस्तार Follow Us

आज एक ओर जहां मंगल ग्रह पर इंसानी कालोनी बसाने की बात हो रही है, वहीं अंतरिक्ष पर एक ऐसा खतरा मंडरा रहा है जो धरती पर संचार के सारे माध्यमों तो तबाह कर सकता है। पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में अब सिर्फ सैटेलाइट्स ही नहीं, बल्कि लाखों की संख्या में मलबे के टुकड़े भी घूम रहे हैं। यह मलबा इतना खतरनाक है कि एक छोटा सा टुकड़ा भी किसी चालू सैटेलाइट को तबाह कर सकता है। आज हम आपको बताएंगे कि स्पेस डेबरिस क्या है और क्यों वैज्ञानिक केसलर सिंड्रोम को लेकर डरे हुए हैं। और पढ़ें loader Trending Videos यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं

क्या है स्पेस डेबरिस?
आसान भाषा में कहें तो अंतरिक्ष में इंसानों द्वारा छोड़ी गई वे तमाम चीजें जो अब काम की नहीं रहीं, स्पेस डेबरिस कहलाती हैं। इसमें खराब सैटेलाइट, रॉकेट के टूटे हिस्से, मिशन के बाद छूटे उपकरण और आपसी टकराव से बने छोटे-छोटे टुकड़े शामिल होते हैं। ये मलबे सेकेंड में कई किलोमीटर की रफ्तार से घूमते रहते हैं। विज्ञापन विज्ञापन

यह इतना खतरनाक क्यों है?
अंतरिक्ष में मलबा तैरता नहीं है, बल्कि यह काफी तेज गति से पृथ्वी का चक्कर काटता है। इसकी गति लगभग 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। इतनी तेज रफ्तार पर एक छोटी सी कील भी किसी सैटेलाइट की सतह में छेद कर सकती है या करोड़ों डॉलर के कम्यूनिकेशन सैटेलाइट को बेकार कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, धरती की कक्षा में लाखों छोटे-बड़े स्पेस डेब्रिस मौजूद हैं। इनमें से कई इतने छोटे होते हैं कि रडार से पकड़ में भी नहीं आते, लेकिन उनकी रफ्तार इतनी तेज होती है कि वे किसी काम कर रहे सैटेलाइट को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

what is space debris and how it can destroy communication system on earth

सैटेलाइट से बढ़ा स्पेस डेबरिस - फोटो : AI ‘केसलर सिंड्रोम’ से तबाह हो सकते हैं सैटेलाइट
1978 में नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड केसलर ने एक सिद्धांत दिया था। इसके अनुसार, यदि अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा एक निश्चित स्तर से ज्यादा हो जाती है, तो ये टुकड़े आपस में टकराने लगेंगे। हर टक्कर से और ज्यादा मलबा पैदा होगा, जिससे एक चेन रिएक्शन शुरू हो जाएगी। इसका नतीजा यह होगा कि पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) मलबे से इतनी भर जाएगी कि वहां कोई भी नया सैटेलाइट भेजना या अंतरिक्ष यात्रा करना असंभव हो जाएगा। मलबे के सैटेलाइट से टकराने पर धरती पर कम्यूनिकेशन सिस्टम पूरी तरह तहस नहस हो सकता है। इससे हमारा इंटरनेट, टीवी सिग्नल और GPS सिस्टम हमेशा के लिए बंद हो सकता है।

बदली जा रही सैटेलाइट की जगह
स्पेस में मलबे से बचने के लिए स्पेसएक्स (SpaceX) अंतरिक्ष में अपनी हजारों सैटेलाइट की जगह बदलने की तैयारी कर रहा है। कंपनी लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात उन हजारों सैटेलाइट की ऊंचाई नीचे लाकर लगभग 480 किलोमीटर करने वाली है जो फिलहाल 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर चक्कर काट रहे हैं। कंपनी ने इस काम को 2026 में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। अंतरिक्ष में अकेले स्टारलिंक के ही करीब 10,000 से ज्यादा सैटेलाइट्स तैनात हैं।

समाधान की कोशिशें और चुनौतियां
दुनियाभर की अंतरिक्ष एजेंसियां अब इस खतरे को गंभीरता से लेने लगी हैं। मलबा हटाने वाले विशेष मिशन, सैटेलाइट को सुरक्षित तरीके से डी-ऑर्बिट करने की तकनीक और नए नियमों पर काम हो रहा है। हालांकि, अंतरिक्ष एक साझा संसाधन है और इसमें किसी एक देश की जिम्मेदारी काफी नहीं है। जब तक वैश्विक स्तर पर ठोस सहयोग नहीं होगा, तब तक स्पेस डेबरिस का खतरा पूरी मानवता के लिए बना रहेगा।

View Original Source