Space Explained:अगर अंतरिक्ष की गहराई में खो जाए एस्ट्रोनॉट, तो कितने दिन तक चल सकती हैं उसकी सांसें? - For How Long An Astronaut Would Survive In Space After Being Lost From Space Station

Space Explained:अगर अंतरिक्ष की गहराई में खो जाए एस्ट्रोनॉट, तो कितने दिन तक चल सकती हैं उसकी सांसें? - For How Long An Astronaut Would Survive In Space After Being Lost From Space Station

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अंतरिक्ष की अनंत गहराई हर किसी हो हैरान करती है। इसके बारे में जानना जितना रोचक है, इसकी सच्चाई उतनी ही कठोर और निर्दयी है। आपने अक्सर कई साइंस-फिक्शन फिल्मों देखा होगा कि अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट किसी हादसे का शिकार हो जाते हैं और स्पेस स्टेशन से बिछड़ जाते हैं। फिल्म को आपके लिए रोचक बनाने के लिए ऐसे सीन फिल्माए जाते हैं, लेकिन अंतरिक्ष के असल हालातों में ऐसे हादसे एस्ट्रोनॉट्स के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं होता। अंतरिक्ष में एक छोटी सी चूक पूरी टीम को मुसीबत में डाल सकती है। अगर कोई एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष में अपनी टीम से बिछड़ जाए तो उसे ढूंढ पाना भी लगभग नामुमकिन होता है।  और पढ़ें loader Trending Videos यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं

यदि एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष में अपने स्पेसक्राफ्ट या स्टेशन से अलग हो जाए, तो उसकी जिंदगी मिनटों में खतरे में पड़ सकती है। वैक्यूम, ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक तापमान में इंसान कितनी देर जीवित रह सकता है, इसका जवाब हैरान कर देने वाला है। इस खबर में हम आपको बताएंगे कि यदि एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष में अपने स्पेसक्रॉफ्ट या स्टेशन की बिछड़ जाए तो वह कितने दिन जिंदा रह सकता है। विज्ञापन विज्ञापन

अंतरिक्ष में खोना मतलब क्या होता है?
अंतरिक्ष में खोने का मतलब है कि एस्ट्रोनॉट अपने स्पेस स्टेशन या स्पेसक्रॉफ्ट से अलग हो जाए और उसके पास सुरक्षित वापसी का कोई साधन न हो। ऐसा आमतौर पर नहीं होता, क्योंकि अंतरिक्ष यात्रा के दौरान कोई तकनीकी खराबी न आए इसके पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं, लेकिन कोई खराबी न हो या मानवीय गलती न हो इसकी गारंटी नहीं होती।

अंतरिक्ष में ये चीजें हैं जान की दुश्मन
अक्सर लोग सोचते हैं कि अंतरिक्ष में वैक्यूम होता है, लेकिन एस्ट्रोनॉट्स के स्पेससूट में ऑक्सीजन होता है जिसके बदौलत वे कई दिनों तक जिंदा रह सकते हैं। ये बात सच तो है, लेकिन पूरी तरह नहीं। दरअसल, अंतरिक्ष में हवा नहीं होती लेकिन यह सिर्फ एक चुनौती नहीं है। अंतरिक्ष में वैक्यूम होने के वजह से शरीर के तरल पदार्थों के उबलने का खतरा रहता है। वहीं, अंतरिक्ष में यदि सूरज की रोशनी सतह पर पड़े तो इसका तापमान 120 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है, जबकि जहां धूप न लगे वहां तापमान -100 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा होता है। यानी एस्ट्रोनॉट्स को एक ही समय में जलाने वाली गर्मी और हड्डियों को जमाने वाले छाए का ठंड झेलना पड़ता है।

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तेज गर्मी और ठंड बनती हैं खतरा - फोटो : AI जनरेटेड इसलिए, अंतरिक्ष में खो जाने पर एस्ट्रोनॉट का जीवित रहना पूरी तरह से उसके स्पेससूट की स्थिति और उसमें उपलब्ध ऑक्सीजन या संसाधनों पर निर्भर करता है, जो आमतौर पर कुछ घंटों से ज्यादा नहीं होता जब तक कि उसे बचाया न जाए।

स्पेस में खो जाने पर कितने घंटे जिंदा रह सकता है एस्ट्रोनॉट?
अंतरिक्ष में अगर कोई एस्ट्रोनॉट खो जाए और उसे रेस्क्यू करने वाला कोई न हो तो उसकी लाइफ उतनी ही होगी जितनी देर के लिए स्पेस सूट में ऑक्सीजन होगा। नासा के हाई-टेक 'एक्सट्रावेहिकुलर मोबिलिटी यूनिट' (EMU) यानी स्पेस सूट में लगभग 6 से 8 घंटे (करीब 480 मिनट) की ऑक्सीजन होती है। जैसे ही यह समय बीतता है, सूट के अंदर कार्बन डाइऑक्साइड का लेवल बढ़ने लगता है। हालांकि, अंतरिक्ष में खो जाने के डर और अकेलेपन के घबराहट से दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं और शरीर तेजी से ऑक्सीजन सोंखने लगता है। ऐसी स्थिती में स्पेस सूट के अंदर ऑक्सीजन और भी जल्दी खत्म हो सकता है।

क्या बचने की कोई उम्मीद होती है?
एस्ट्रोनॉट जब सैटेलाइट को रिपेयर करने के लिए स्पेस स्टेशन से बाहर निकलते हैं, तब उन्हें भटकने के बचाने के लिए उनके स्पेस सूट को स्टील की रस्सी से बांधा जाता है। अगर फिर भी किसी गड़बड़ी के वजह से रस्सी टूट गई तो एस्ट्रोनॉट्स की पीठ पर गैस से चलने वाला एक छोटा सा थ्रस्टर पैकेट लगा होता है, जिसकी मदद से वह स्पेस स्टेशन पर वापस लौट सकते हैं। लेकिन अगर इसकी गैस खत्म हो गई, तो एस्ट्रोनॉट का शरीर अंतरिक्ष में एक सैटेलाइट के जैसे अनंत काल तक धरती का चक्कर लगाता रहेगा।

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