Ujjain News: Woman’s Vein Cut In Sterilization Camp;20 Units Blood Given But Govt Hospital Failed To Treat Her - Madhya Pradesh News
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नसबंदी शिविर में महिला की गलत नस कटने के कारण हुए अधिक रक्तस्राव के बाद महिला को 20 यूनिट अतिरिक्त ब्लड चढ़ाया गया। बावजूद इसके महिला की हालत में कोई सुधार नहीं आया है।
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झारड़ा में तीन दिन पहले आयोजित नसबंदी शिविर में डॉक्टर की गंभीर लापरवाही के कारण एक महिला की जान पर बन आई। ऑपरेशन के दौरान गलत नस कट जाने से तेज रक्तस्राव शुरू हो गया। करीब 20 यूनिट रक्त चढ़ाने के बाद भी महिला की हालत में सुधार नहीं हुआ। चरक अस्पताल में इलाज संभव न होने पर अब उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया है।
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9 जनवरी शुक्रवार को झारड़ा स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी शिविर लगाया गया था, जिसमें 30 महिलाओं की नसबंदी की गई। पिपल्या झारड़ा निवासी रुकमाबाई (29), पत्नी जितेंद्र गायरी का ऑपरेशन सातवें नंबर पर किया गया। जिला चिकित्सालय के सर्जन डॉ. राजेंद्र उपलावदिया ने यह ऑपरेशन किया था।
परिजनों के अनुसार ऑपरेशन के दौरान ही रुकमाबाई की तबीयत बिगड़ने लगी। दोपहर 2 बजे उन्हें ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया और शाम 7 बजे तक रक्तस्राव रोकने की कोशिश चलती रही, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं आई। इसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें चरक अस्पताल रैफर कर दिया।
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रुकमा के पति जितेंद्र ने बताया कि शुक्रवार रात वे पत्नी को चरक अस्पताल लेकर पहुंचे लेकिन वहां भी इलाज नहीं मिल सका। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और सलाह दी कि मरीज को कहीं और ले जाएं क्योंकि स्थिति गंभीर है। इस दौरान वे पाटीदार अस्पताल के संपर्क में आए और रुकमाबाई को वहां भर्ती कराया। यहां डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन किया और उसे लगभग 20 यूनिट ब्लड दिया गया। फिलहाल महिला की हालत स्थिर बताई जा रही है लेकिन वह अभी भी आईसीयू में भर्ती है।
रुकमाबाई के पति जितेंद्र ने बताया कि पाटीदार अस्पताल में इलाज पर अब तक करीब ढाई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। मजदूरी करके जीवनयापन करने वाले जितेंद्र ने यह पैसे आभूषण बेचकर और उधार लेकर जुटाए।
वहीं सीएमएचओ डॉ. अशोक कुमार पटेल ने कहा कि रुकमाबाई को ऑपरेशन के दौरान कुछ चिकित्सकीय समस्या आई थी और जिला अस्पताल के ओटी में तकनीकी परेशानी के चलते उन्हें सरकारी खर्च पर पाटीदार अस्पताल भेजा गया। उन्होंने कहा कि अब महिला खतरे से बाहर है। इसके विपरीत जितेंद्र का कहना है कि उन्हें सरकारी अस्पताल से न तो उचित इलाज मिला और न ही कोई सहारा या मदद।
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