Up:'मैं युवराज...मेरी मौत हादसे से नहीं, सिस्टम की बेरुखी से'; गड्ढे में डूबे युवा इंजीनियर की आखिरी कहानी - Noida Death Case Yuvraj Final Story My Death Was Not An Accident But System Negligence
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दोस्तों से मिलकर मैं घर के लिए निकला था। रात करीब 12 बज रहे थे। स्पीड नियंत्रित नहीं हो सकी और अगले ही पल में कार समेत सड़क के किनारे बने पानी से भरे बेसमेंट के लिए बनाए गए गड्ढे में जा गिरा। सब कुछ सेंकडों में हुआ।
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कार के भीतर पानी तेजी से भरने लगा। मैंने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला। शीशा तोड़ने की कोशिश की लेकिन उस पल जान जाने के डर से हाथ कांप रहे थे। ताकत होते हुए भी हिम्मत जवाब दे रही थी।
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मैं पूरी ताकत से चीखा-चिल्लाया लेकिन मेरी आवाज कार के भीतर ही दबी रह गई। किसी तरह हिम्मत जुटाकर सनरूफ खोला और कार की छत पर आ गया। उस पल भगवान और पापा की याद आई। कांपते हाथों से पापा को फोन किया। बस इतना कहा, मैं गड्ढे में फंस गया हूं जल्दी आइए। कार धीरे-धीरे डूब रही थी।
पानी मेरी ओर बढ़ रहा था। आंखों के सामने परिजन और दोस्तों के चेहरे तैरने लगे। लगा... अब नहीं बचूंगा। कुछ ही देर में पापा सड़क के पास पहुंचे। वह जोर-जोर से चीखने लगे। मुझे लगा-अब मदद आ जाएगी। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई ताकि उन्हें मेरी लोकेशन दिख जाए। लेकिन मदद सिर्फ सड़क तक आई, गड्ढे के अंदर नहीं उतरी। मैं बेबस और असहाय खड़ा इंतजार करता रहा। कार और नीचे धंसती जा रही थी। मैं मजबूरी में कार की छत पर खड़ा हो गया।
थोड़ी देर में पुलिस और दमकल कर्मी भी पहुंच गए। उम्मीद फिर जगी अब तो बच जाऊंगा लेकिन यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी। सब लोग ऊपर खड़े थे। नीचे उतरने को कोई तैयार नहीं था। पानी गहरा है, जोखिम है-यह कहकर इंतजार किया जाता रहा। रस्सी देर से आई। उपकरण देर से पहुंचे और वक्त हाथ से निकलता चला गया।
वह सड़क, जिस पर न बैरिकेड था, न चेतावनी बोर्ड, न लाल झंडी, आज मेरी मौत की गवाह बन रही थी। सिस्टम मौके पर था, लेकिन संवेदना नहीं थी। तिल-तिल करके मौत मेरे करीब आ रही थी और मेरी उम्मीद भी डूबने लगी थी। पानी मेरी छाती तक आ चुका था, सांसें टूटने लगीं और आवाज गले में अटक गई।
मैं सड़क पर आखिरी बार उम्मीदभरी हसरत से देख रहा था। नकारों की भीड़ के बीच मेरे पापा खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और बिलख रहे थे। वर्दी में लोग, सरकारी गाड़ियां और एक ऐसा सिस्टम जो फाइलों में तो तेज है, लेकिन इंसान को बचाने के लिए पानी में उतरने से डरता है।
काश उस सड़क पर पहले ही बैरिकेड लगा होता। काश गड्ढे को ढक दिया गया होता। काश सिस्टम हादसे से पहले जागा होता। मैं जिंदा था। मदद सामने थी लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे मेरी जिंदगी हार गई। आज मैं नहीं हूं लेकिन सवाल अब भी पानी में तैर रहा है। क्या इस सिस्टम को किसी के डूब जाने के बाद ही बचाव की जरूरत याद आती है?
मैं जिंदा था। मदद सामने थी लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे मेरी जिंदगी हार गई। आज में नहीं हूं लेकिन सवाल अब भी पानी में तैर रहा है। क्या इस सिस्टम को किसी के डूब जाने के बाद ही बचाव की जरूरत याद आती है? आज अधिकारी अपनी सफाई दे रहे हैं। अगर किसी में भी मानवीय संवेदना होगी तो मुझे न्याय दिलाने के लिए सच बोलेगा...
-यह आपबीती परिजनों, प्रत्यक्षदर्शियों और जांच से जुड़े तथ्यों के आधार पर तैयार की गई है।