मनुष्य की कामनाएं अधूरी क्यों रह जाती हैं, क्या कारण है इच्छाओं के न पूरा होने का - why human desires remain unfulfilled reasons behind unmet wishes in life kyu kamna adhuri reh jati hai

मनुष्य की कामनाएं अधूरी क्यों रह जाती हैं, क्या कारण है इच्छाओं के न पूरा होने का - why human desires remain unfulfilled reasons behind unmet wishes in life kyu kamna adhuri reh jati hai

मान लीजिए आप किसी दुकान में जाते हैं, मनपसंद वस्तु देखते हैं, उसे हाथ में भी उठा लेते हैं, पर यदि आपकी जेब में पैसा नहीं है, तो दुकानदार क्या वह वस्तु आपको देगा, नहीं। अंततः बिना उचित मूल्य चुकाए वह वस्तु आपको वापस रखनी पड़ेगी। ठीक इसी प्रकार यह संपूर्ण संसार ईश्वर की व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है और मनुष्य इसमें एक साधक की भांति चलता है। यहां इच्छाएं वस्तुओं के समान हैं और उन्हें प्राप्त करने की शक्ति पुण्य है। जितना पुण्य आपके पास संचित है, उतनी ही आपकी कामनाओं की पूर्ति संभव है। पुण्य नहीं है, तो इच्छा पूरी होने की देहरी तक पहुँचकर भी व्यक्ति खाली हाथ लौट आता है। जौहरी की दुकान का उदाहरण इसे और स्पष्ट करता है। आप हीरे तक पहुँचते हैं, उसे हाथ में लेते हैं, पर जैसे ही यह पता चलता है कि आपके पास भुगतान करने की क्षमता नहीं है, जौहरी हीरा वापस रख लेता है।संसार में भी ऐसा ही होता है, कामना दिखाई देती है, अवसर मिलता है, पर अंततः वह हाथ से फिसल जाती है। जब ऐसा होता है, तो अज्ञानवश मनुष्य भगवान, भाग्य और गुरुजनों को दोष देने लगता है। सत्संग के दौरान संत बताते हैं कि, ‘तुम कर्मभूमि में आए हो, रोने या शिकायत करने के लिए नहीं, बल्कि पुण्य कमाने के लिए।’ यह जीवन केवल मांगने की जगह नहीं है, यह कमाने की भूमि है, पुण्य कमाइए, धर्म-कर्म करिए, राम नाम का स्मरण, भजन, सेवा, दान, करुणा और निस्वार्थ कर्म, ये सभी पुण्य अर्जित करने के साधन हैं।

जब पुण्य बढ़ता है, तो कामनाएं स्वतः पूरी होने लगती हैं। यदि बार-बार प्रयास के बाद भी इच्छाएं पूरी नहीं हो रहीं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर आपसे विमुख हैं, इसका अर्थ केवल इतना है कि आपके पास अभी उतना पुण्य नहीं है। इसलिए जीवन को ईश्वर की व्यवस्था और दैवी विधान के रूप में समझिए, जितना पुण्य आपके पास होगा, उतनी ही प्राप्ति संभव होगी। इसलिए सांसारिक भाषा में यह कहा जा सकता है कि संसार को एक दुकान समझिए और स्वयं को एक खरीददार। पहले पुण्य अर्जित कीजिए, फिर कामनाएं अपने आप पूरी होंगी।

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